राजगोपाल ने कहा कि उनका उद्देश्य खुद को पीड़ित के रूप में पेश करना नहीं, बल्कि आम नागरिकों की कठिनाई को सामने लाना है। उन्होंने लिखा, ‘‘यदि पत्रकारिता में पूरा पेशेवर जीवन बिताने और एक प्रसिद्ध अखबार का संपादन करने वाले व्यक्ति को ऐसी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है, तो कल्पना कीजिए कि वास्तव में हाशिये पर रहने वाले लोगों को क्या झेलना पड़ता होगा।’’ उनकी इस पोस्ट पर तीखी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं और विपक्षी नेताओं ने इसे विधानसभा चुनावों से पहले पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा कराए गए विवादास्पद एसआईआर अभियान से जोड़ा। कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा ने कहा कि यह घटना उस ‘‘अतार्किकता के स्तर’’ को दर्शाती है, जहां देश पहुंच गया है। उन्होंने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘क्या हम अपने संस्थापक नेताओं द्वारा बड़े परिश्रम से स्थापित कानून के शासन वाले राष्ट्र की पहचान को मिटाने पर आमादा हैं! यह बेहद दुखद है।’’ तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सदस्य सागरिका घोष ने राजगोपाल के अनुभव को ‘‘स्तब्ध करने वाला’’ और ‘‘दुखद’’ बताया। उन्होंने कहा, ‘‘यदि यह द टेलीग्राफ के पूर्व संपादक आर. राजगोपाल के साथ हो सकता है, तो कल्पना कीजिए कि कम संसाधनों वाले नागरिक क्या झेल रहे होंगे।’’
माकपा महासचिव एम. ए. बेबी ने आरोप लगाया कि एसआईआर प्रक्रिया का उपयोग लोगों को मताधिकार से वंचित करने और ‘‘भाजपा के विभाजनकारी हिंदुत्व एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए नागरिकता तय करने’’ में किया जा रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘शुरुआत से ही माकपा ने चेतावनी दी थी कि एसआईआर प्रक्रिया देश के गरीब और कमजोर वर्गों को मताधिकार से वंचित करेगी। लेकिन अब आर. राजगोपाल जैसे प्रतिष्ठित संपादक और वरिष्ठ पत्रकार को भी मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया गया है।’’ पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद पैदा हो गया, क्योंकि लाखों मतदाताओं के नाम या तो सूची से हटा दिए गए हैं या उन्हें जांच के अधीन रखा गया है। उच्चतम न्यायालय ने इस प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन नाम हटाने को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के लिए उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की अध्यक्षता में अपीलीय न्यायाधिकरण गठित करने का निर्देश दिया।

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