डॉ. प्रेम कुमार सुंदरम, वरिष्ठ वैज्ञानिक ने यंत्रीकृत बुवाई की वैज्ञानिक विधियों एवं उनके लाभों की जानकारी देते हुए किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, हरित खाद, फसल अवशेष प्रबंधन तथा अन्य वैज्ञानिक कृषि उपायों को अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन एवं मृदा संरक्षण उपायों को अपनाकर दीर्घकाल तक भूमि की उत्पादकता बनाए रखी जा सकती है। डॉ. मनीषा टम्टा, वैज्ञानिक ने मौसम आधारित फसल प्रबंधन, कम वर्षा एवं जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों तथा उनके समाधान पर किसानों को जानकारी दी। उन्होंने ढैंचा को हरित खाद के रूप में अपनाने के लाभों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इससे मृदा में कार्बनिक कार्बन एवं उर्वरता में वृद्धि होती है, लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ती है तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है। कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिकों ने किसानों से विभिन्न तकनीकी विषयों पर संवाद किया तथा प्रदर्शन प्रक्षेत्र का अवलोकन करते हुए धान की सीधी बुवाई एवं ढैंचा आधारित हरित खाद तकनीक को अपनाने में विशेष रुचि दिखाई। कार्यक्रम के सफल आयोजन में प्रगतिशील किसान श्री आशीष कुमार सिंह, श्री विनय कुमार बिहारी (फील्ड असिस्टेंट), श्री नरेंद्र यादव एवं श्री ओम प्रकाश का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। यह प्रक्षेत्र भ्रमण-सह-प्रशिक्षण कार्यक्रम "खेत बचाओ अभियान" के अंतर्गत किसानों तक संसाधन-संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य संवर्धन एवं जलवायु-अनुकूल धान उत्पादन तकनीकों के प्रभावी प्रसार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हुआ।
गया जी/पटना (रजनीश के झा), 30 जून। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना द्वारा अनुसूचित जाति उप-योजना के अंतर्गत "खेत बचाओ अभियान" के तहत 30 जून 2026 को गया जी जिले के टेकारी प्रखंड अंतर्गत सिमुआरा पंचायत के गुलेरियाचक गाँव में धान की सीधी बुवाई (डीएसआर), ढैंचा आधारित हरित खाद एवं संतुलित उर्वरक उपयोग विषय पर प्रक्षेत्र भ्रमण-सह-प्रशिक्षण एवं किसान जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों के बीच धान की सीधी बुवाई, ढैंचा आधारित हरित खाद, संतुलित उर्वरक उपयोग तथा मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन जैसी वैज्ञानिक एवं संसाधन-संरक्षण तकनीकों का प्रसार कर टिकाऊ, लाभकारी एवं जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देना था। कार्यक्रम में कुल 145 किसानों ने भाग लिया, जिनमें 52 महिला एवं 93 पुरुष किसान शामिल थे। प्रतिभागी किसानों ने धान की सीधी बुवाई एवं ढैंचा हरित खाद के प्रदर्शन प्रक्षेत्र का भ्रमण कर इन तकनीकों के व्यावहारिक पहलुओं का अवलोकन किया। इस दौरान उन्हें मृदा स्वास्थ्य सुधार, जल संरक्षण, उत्पादन लागत में कमी तथा सतत कृषि में इन तकनीकों की उपयोगिता के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई। तकनीकी सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. राकेश कुमार, वरिष्ठ वैज्ञानिक ने पारंपरिक धान रोपाई पद्धति की तुलना में धान की सीधी बुवाई (डीएसआर) के लाभों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इस तकनीक से श्रम एवं सिंचाई जल की आवश्यकता कम होती है, फसल की समय पर स्थापना सुनिश्चित होती है तथा उत्पादन लागत में उल्लेखनीय कमी आती है। उन्होंने संरक्षण कृषि में हैप्पी सीडर की उपयोगिता एवं उसके प्रभावी उपयोग का भी प्रदर्शन किया।

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