- हर शहर में बढ़ रहे हादसे, सिर फूट रहे, हाथ-पैर टूट रहे; सुरक्षा मानकों पर बड़ा सवाल
- होटलों के खतरनाक कांच के दरवाजों पर विशेष पड़ताल
विनायक प्लाजा स्थित रेस्टोरेंट पर उठ रहे सवाल
शहर के व्यस्त व्यावसायिक क्षेत्र में स्थित विनायक प्लाजा के पांचवें तल पर संचालित एक रेस्टोरेंट के कांच के दरवाजे को लेकर भी लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं। प्रत्यक्षदर्शियों और ग्राहकों का कहना है कि यहां लगा पूर्ण पारदर्शी कांच का दरवाजा कई बार हादसों का कारण बन चुका है। लोगों के अनुसार कई ग्राहक दरवाजे को खुला रास्ता समझकर उससे टकरा चुके हैं, जिससे उन्हें चोटें आई हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि ऐसे मामलों में अक्सर वास्तविक कारणों को सार्वजनिक नहीं किया जाता और घटनाओं को अन्य वजहों से जोड़कर मामला शांत कराने का प्रयास किया जाता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन लगातार सामने आ रही शिकायतों ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
सिर्फ वाराणसी नहीं, देशभर के शहरों की समस्या
यह समस्या किसी एक होटल या एक शहर तक सीमित नहीं है। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, जयपुर, भोपाल, पटना, इंदौर और वाराणसी जैसे अनेक शहरों में पारदर्शी कांच के दरवाजों से जुड़े हादसे सामने आ चुके हैं। कई बार बच्चे, बुजुर्ग और पहली बार आने वाले ग्राहक सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। विशेष रूप से भीड़भाड़ वाले रेस्टोरेंट, बैंक्वेट हॉल, होटल लॉबी और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में लगे बिना मार्किंग वाले कांच के दरवाजे दुर्घटनाओं की बड़ी वजह बन रहे हैं।
सुरक्षा मानकों का कितना हो रहा पालन?
भवन निर्माण और अग्नि सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार कांच के दरवाजों पर स्पष्ट स्टिकर, रंगीन पट्टी, लोगो या चेतावनी चिह्न लगाना आवश्यक माना जाता है, ताकि दूर से ही उसकी पहचान हो सके। इसके अलावा टेम्पर्ड या सेफ्टी ग्लास का उपयोग, नियमित निरीक्षण और पर्याप्त रोशनी भी जरूरी है। दुर्भाग्य से अनेक प्रतिष्ठानों में सौंदर्य के नाम पर पूरी तरह पारदर्शी शीट लगा दी जाती है, जिससे ग्राहक भ्रमित हो जाते हैं।
सबसे अधिक खतरा किन्हें?
बच्चों को, जो दौड़ते हुए कांच से टकरा जाते हैं। बुजुर्गों को, जिनकी दृष्टि अपेक्षाकृत कमजोर होती है। भीड़भाड़ के समय ग्राहकों को। मोबाइल फोन देखते हुए चलने वालों को। पहली बार आने वाले आगंतुकों को।
प्रशासन कब करेगा व्यापक जांच?
लगातार बढ़ती घटनाओं के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या नगर निगम, विकास प्राधिकरण, अग्निशमन विभाग और श्रम-सुरक्षा से जुड़े विभाग ऐसे प्रतिष्ठानों की नियमित जांच करते हैं? यदि करते हैं तो बिना चेतावनी चिन्ह वाले कांच के दरवाजे कैसे संचालित हो रहे हैं? विशेषज्ञों का कहना है कि जिस प्रकार लिफ्ट, फायर सिस्टम और आपातकालीन निकास की जांच होती है, उसी प्रकार सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में लगे कांच के दरवाजों की सुरक्षा ऑडिट भी अनिवार्य की जानी चाहिए।
हादसे रोकने के लिए क्या जरूरी?
✔ कांच के दरवाजों पर स्पष्ट मार्किंग या स्टिकर लगाना
✔ टेम्पर्ड एवं सेफ्टी ग्लास का उपयोग
✔ प्रवेश और निकास पर पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था
✔ नियमित सुरक्षा ऑडिट
✔ हादसा होने पर अनिवार्य रिपोर्टिंग व्यवस्था
✔ होटल और रेस्टोरेंट संचालकों की जवाबदेही तय करना
सवाल जो जवाब मांगते हैं
क्या आकर्षक डिजाइन लोगों की सुरक्षा से अधिक महत्वपूर्ण है? जिन स्थानों पर बार-बार दुर्घटनाएं हो रही हैं, वहां अब क सुधारात्मक कदम क्यों नहीं उठाए गए? क्या सुरक्षा मानकों का पालन केवल कागजों तक सीमित है? किसी बड़ी जनहानि के बाद ही प्रशासन जागेगा? कांच के ये पारदर्शी दरवाजे आधुनिकता का प्रतीक जरूर हैं, लेकिन यदि सुरक्षा उपायों की अनदेखी होती रही तो यह चमक किसी दिन बड़ी त्रासदी का कारण भी बन सकती है। प्रशासन, भवन स्वामियों और होटल प्रबंधन को समय रहते चेतना होगा, क्योंकि अगला हादसा किसके साथ होगा, यह कोई नहीं जानता।

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