दिल्ली : पेरिस समझौते के 10 साल बाद संपन्न देश 2030 और 2035 के लक्ष्यों से पिछड़े - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 8 जून 2026

दिल्ली : पेरिस समझौते के 10 साल बाद संपन्न देश 2030 और 2035 के लक्ष्यों से पिछड़े

  • भारत सहित 'बेसिक' देश अपने वादों को पूरा करने के नजदीक: सीईईडब्ल्यू रिपोर्ट

Paris-samjhauta
नई दिल्ली (संवाददाता), 8 जून । पेरिस समझौते के एक दशक से भी अधिक समय बीतने के बाद, वैश्विक जलवायु कार्रवाई (ग्लोबल क्लाइमेट एक्शन) की विश्वसनीयता अब नए वादों से ज्यादा इस बात पर निर्भर करती है कि देश अपने मौजूदा वादों को पूरा कर रहे हैं या नहीं। 'काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर' (CEEW) के एक नए स्वतंत्र अध्ययन में सामने आया है कि तीन प्रमुख जलवायु वार्ता समूह — अंब्रेला ग्रुप (Umbrella Group), यूरोपीय संघ (EU), और एनवायरनमेंटल इंटीग्रिटी ग्रुप (EIG) — सामूहिक रूप से अपने 2030 और 2035 दोनों के जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में पीछे रह सकते हैं। अनुमान के मुताबिक, ये समूह अपने 2030 के 'राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान' (NDC) लक्ष्यों की तुलना में 9 प्रतिशत अधिक उत्सर्जन करेंगे, और 2035 में यह आंकड़ा 2035 के लिए निर्धारित लक्ष्य की तुलना में 19 प्रतिशत अधिक हो जाने का अनुमान है। CEEW का यह अध्ययन, 'होल्डिंग अप द मिरर: ट्रैकिंग क्लाइमेट एक्शन अक्रॉस यूएनएफसीसीसी नेगोशिएटिंग ग्रुप्स इन द एरा ऑफ जियोपॉलिटिकल अनसर्टेनिटी', जर्मनी के बॉन में 'जून क्लाइमेट मीटिंग्स' (SB64) की शुरुआत के साथ जारी हो रहा है। यह बैठक यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के तहत सहायक निकायों का 64वां सत्र है। यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है, जब भू-राजनीतिक अस्थिरता, जलवायु कार्रवाई में देरी और बढ़ते अविश्वास के कारण अंतरराष्ट्रीय जलवायु सहयोग पर भारी दबाव है। इसके विपरीत, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन समेत 'बेसिक' (BASIC) समूह के अधिकांश देश अपने 2030 के लिए निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने के काफी नजदीक हैं, भले ही ऐतिहासिक रूप से प्रदूषण फैलाने में उनकी जिम्मेदारी बहुत कम रही है और उनके सामने विकास की बड़ी चुनौतियां भी हैं। यह विश्लेषण देशों की ओर से खुद UNFCCC को सौंपे गए दस्तावेजों पर आधारित है। इसमें द्विवार्षिक पारदर्शिता रिपोर्ट (Biennial Transparency Reports), कॉमन टैबुलर फॉर्मेट डेटासेट और कॉमन रिपोर्टिंग टेबल शामिल हैं। रवि एस. प्रसाद, विशिष्ट फेलो, सीईईडब्ल्यू और भारत के पूर्व मुख्य जलवायु परिवर्तन वार्ताकार , ने कहा, "पेरिस समझौते के 10 साल बाद, दुनिया जलवायु नेतृत्व (क्लाइमेट लीडरशिप) को केवल घोषणाओं के आधार पर नहीं माप सकती है। वादों को पूरा करना ही असली परीक्षा है। दक्षिण एशिया और व्यापक ग्लोबल साउथ (विकासशील देश) यह दिखा रहे हैं कि विकास और जलवायु कार्रवाई दोनों साथ-साथ चल सकते हैं, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि देशों के लक्ष्यों को निष्पक्षता से आंका जाए और उन्हें जरूरी मदद दी जाए। संपन्न देशों को अपनी रफ्तार बढ़ानी होगी, ताकि वे न केवल अपने लक्ष्यों को पूरा कर सकें, बल्कि उन देशों के लिए पर्याप्त कार्बन स्पेस छोड़ सकें जो अभी भी अपनी बुनियादी विकास की जरूरतें पूरी करने में लगे हुए हैं। जलवायु कूटनीति (क्लाइमेट डिप्लोमेसी) का अगला चरण जवाबदेही होना चाहिए: कौन कार्रवाई कर रहा है, कौन पीछे छूट रहा है, और कौन दूसरों को उनके वादे पूरा करने में सक्षम बना रहा है।"


केवल तीन देश ही 2030 और 2035 दोनों लक्ष्यों को पूरा करने के रास्ते पर हैं

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विभिन्न देशों द्वारा UNFCCC को सौंपी गई जलवायु पारदर्शिता रिपोर्टों का उपयोग करते हुए CEEW का यह अध्ययन पता लगाता है कि प्रमुख वार्ता समूह उत्सर्जन कटौती के लिए सही रास्ते पर हैं या नहीं। अंब्रेला ग्रुप, यूरोपीय संघ (EU) और ईआईजी (EIG) के जिन देशों का आकलन किया गया है, उनमें से केवल कजाकिस्तान, जॉर्जिया और यूक्रेन के अपने 2030 और 2035 के जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने का अनुमान है। नॉर्वे अपना 2030 का लक्ष्य, जबकि न्यूजीलैंड अपना 2035 का लक्ष्य पूरा कर सकता है। हालांकि, कई अन्य देशों के पीछे रहने का अनुमान है। अध्ययन में पाया गया है कि कटौती के लक्ष्य तय होने के बावजूद आइसलैंड और दक्षिण कोरिया में उत्सर्जन बढ़ सकता है। सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में पाया गया है कि 'बेसिक' (BASIC) देश अपने 2030 के वादों को पूरा करने के मामले में अधिक मजबूती दिखा रहे हैं। हालांकि, इस समूह के अलग-अलग देशों की प्रगति में थोड़ा अंतर है। भारत ने अपनी गैर-जीवाश्म स्थापित क्षमता (non-fossil installed capacity) के 50 प्रतिशत के लक्ष्य को समय से पहले हासिल कर लिया है। इसके साथ,  भारत अपने उत्सर्जन तीव्रता (emissions intensity) और कार्बन सिंक (carbon sink) के लक्ष्यों की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत ने अपनी जीडीपी उत्सर्जन तीव्रता में करीब 37 प्रतिशत की कमी दर्ज की है और लगभग 2.4 अरब टन (tCO₂e) का अतिरिक्त कार्बन सिंक तैयार किया है।


चीन ने अपने पवन और सौर ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य और फॉरेस्ट स्टॉक वैल्यूम (forest stock volume) के लक्ष्य को 2030 से पहले ही पूरा कर लिया है। उसने 2005 के स्तर की तुलना में प्रति इकाई जीडीपी पर ऊर्जा से संबंधित कार्बन डाइ ऑक्साइट उत्सर्जन में लगभग 51 प्रतिशत की कटौती की है। वहीं, दक्षिण अफ्रीका का 2022 का उत्सर्जन लगभग 39.4 करोड़ टन (394 MtCO₂e) था, जो पहले से ही उसके 2030 के लिए निर्धारित लक्ष्य के दायरे में है। सुमित प्रसाद, सीनियर प्रोग्राम लीड, सीईईडब्ल्यू, ने कहा, “पेरिस समझौते के तहत पहला पारदर्शिता चक्र (transparency cycle) देशों को आईना दिखाता है। अब सवाल यह है कि क्या मौजूदा उपाय वर्तमान लक्ष्यों को भरोसेमंद ढंग से पूरा कर सकते हैं। जो देश अपने कटौती लक्ष्य से पीछे रह गए हैं, उन्हें 2030 से पहले अपने मौजूदा कदमों को मजबूत करना होगा, अपने 2035 के लक्ष्यों की विश्वसनीयता में सुधार लाना होगा और उत्सर्जन कटौती के बोझ को भविष्य के लिए टालने से बचना होगा। जलवायु प्रक्रिया में दोबारा विश्वास जगाने के लिए, संपन्न देशों की घरेलू स्तर पर तेज जलवायु कार्रवाई और विकासशील देशों को मिलने वाली वित्तीय व तकनीकी सहायता सबसे महत्वपूर्ण होगी।”


वार्षिक कटौती में यूरोपीय संघ को सालाना 4.8% ; अमेरिका और कनाडा को 5-6% की तेजी लाने की जरूरत

सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में पाया गया है कि कई संपन्न देशों को अपने 2030 के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए उत्सर्जन कटौती में तेजी लानी होगी। यूरोपीय संघ (EU) को 2022 के बाद हर साल उत्सर्जन में 4.8 प्रतिशत की कमी करनी होगी, जो उसकी पिछली कटौती की रफ्तार से लगभग चार गुना अधिक है। यूनाइटेड किंगडम (UK) को 2022 के बाद अपनी वार्षिक उत्सर्जन कटौती की दर को दोगुने से अधिक बढ़ाकर 5.4 प्रतिशत करना होगा। वहीं, संयुक्त राज्य अमेरिका (US) और कनाडा को 2022 के बाद अपनी वार्षिक उत्सर्जन कटौती की दरों में क्रमशः 5 प्रतिशत और 6 प्रतिशत बढ़ोतरी करने की आवश्यकता होगी। ये निष्कर्ष बताते हैं कि विकसित देशों की ओर से जलवायु कार्रवाई में देरी से उत्सर्जन कटौती का एक बड़ा बोझ 2030 के बाद की अवधि के लिए टल सकता है, जिससे विकासशील देशों के लिए बचा हुआ कार्बन स्पेस घट जाएगा।


पेरिस समझौते के बाद सभी समूहों ने उत्सर्जन वृद्धि को घटाया है, लेकिन रफ्तार अलग-अलग रही है

अध्ययन से पता चलता है कि पेरिस समझौते के बाद से आकलन में शामिल सभी प्रमुख वार्ता समूहों ने उत्सर्जन की वृद्धि दर को धीमा किया है, लेकिन इसकी रफ्तार और विस्तार में काफी अंतर है। 'बेसिक' (BASIC) समूह ने अपनी वार्षिक उत्सर्जन वृद्धि दर को पेरिस समझौते के पूर्व के 3.3 प्रतिशत की तुलना में पेरिस समझौते के बाद 2.1 प्रतिशत कर दिया। अगर पेरिस समझौते से पहले की प्रवृत्तियां बनी रहने की तुलना में वर्ष 2016-22 के दौरान 'बेसिक' देशों ने सामूहिक रूप से 8.5 गीगाटन (GtCO₂e) उत्सर्जन कम किया है। यह कटौती 2022 में हुए कुल वैश्विक उत्सर्जन के 10 प्रतिशत से भी अधिक के बराबर है। इसके विपरीत, अंब्रेला ग्रुप, यूरोपीय संघ (EU) और ईआईजी (EIG) ने पेरिस समझौते के बाद के समय में पेरिस समझौते से पहले की प्रवृत्तियों को जारी न रखते हुए केवल 3.7 गीगाटन (GtCO₂e) उत्सर्जन को घटाया है। अध्ययन यह भी बताता है कि कैसे इन वार्ता समूहों के भीतर कुछ ही देशों में सबसे ज्यादा उत्सर्जन होता है। वर्ष 2009-22 के दौरान, अध्ययन में शामिल समूहों के कुल उत्सर्जन में आधे से अधिक हिस्सेदारी 'बेसिक' (BASIC) समूह की थी, जिसमें अकेले चीन की हिस्सेदारी अपने समूह के कुल उत्सर्जन में 74 प्रतिशत थी। वहीं, अंब्रेला ग्रुप के भीतर, अकेले अमेरिका की हिस्सेदारी अपने समूह के कुल उत्सर्जन में 63 प्रतिशत थी। यह बताता है कि कैसे कुछ बड़े देशों के फैसले पूरे समूहों की जलवायु विश्वसनीयता निर्धारित कर सकते हैं।


जलवायु कूटनीति को अब केवल वादों से आगे जवाबदेही की तरफ बढ़ना होगा

CEEW का अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि पेरिस समझौते की विश्वसनीयता अब घोषणाओं पर नहीं, बल्कि इस बात पर निर्भर करेगी कि उन्हें कितना लागू किया जा रहा है। यह रिपोर्ट उन देशों और समूहों से अपनी घरेलू कार्रवाई को तुरंत तेज करने का आग्रह करती है जो अपने लक्ष्यों से पीछे चल रहे हैं। साथ ही, उन्हें अपने 2035 के लक्ष्यों को भरोसेमंद रास्तों (pathways) के साथ जोड़ने और उत्सर्जन कटौती को 2030 के बाद टालने से बचने की सलाह देती है। इसमें इस बात पर भी जोर दिया गया है कि संपन्न देशों को खुद तेजी से कदम उठाने चाहिए और साथ ही विकासशील देशों को वित्तीय व तकनीकी सहायता भी देनी चाहिए। निष्पक्षता बनाए रखने, विकास को बढ़ावा देने और उन देशों के लिए पर्याप्त कार्बन स्पेस बचाने के लिए यह बेहद जरूरी होगा जो अभी भी अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में जुटे हैं।

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