समय की कमी क्यों बढ़ रही है?
आज अधिकांश कामकाजी दंपतियों का दिन सुबह से ही भागदौड़ में शुरू होता है। कार्यालय आने-जाने में लगने वाला समय, बढ़ता ट्रैफिक, कार्यस्थल का दबाव और डिजिटल दुनिया की निरंतर व्यस्तता परिवार के समय को प्रभावित कर रही है। विशेषकर महानगरों में कई माता-पिता सुबह घर से निकलते हैं और शाम को देर से लौटते हैं। ऐसे में बच्चों के साथ उनका प्रत्यक्ष संवाद सीमित रह जाता है। सप्ताहांत भी कई बार सामाजिक कार्यक्रमों, अतिरिक्त कार्य या घरेलू जिम्मेदारियों में निकल जाता है। विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों से संकेत मिलता है कि शहरी कामकाजी परिवारों में माता-पिता बच्चों के साथ प्रतिदिन औसतन 1 से 3 घंटे का प्रत्यक्ष समय बिता पाते हैं। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि माता-पिता बच्चों की शिक्षा और गतिविधियों को लेकर पहले की तुलना में अधिक चिंतित हैं, लेकिन उनके पास समय अपेक्षाकृत कम है। कई अभिभावक स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे बच्चों के साथ पर्याप्त समय न बिता पाने के कारण अपराधबोध महसूस करते हैं।
बच्चों पर क्या पड़ रहा है प्रभाव?
1. भावनात्मक दूरी : बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में माता-पिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। जब संवाद कम होता है तो बच्चे अपनी भावनाएँ साझा करने में संकोच करने लगते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे बच्चे कई बार अपनी समस्याएँ दोस्तों, सोशल मीडिया या इंटरनेट पर तलाशने लगते हैं, जबकि उन्हें सबसे पहले परिवार से मार्गदर्शन मिलना चाहिए।
2. बढ़ती अकेलेपन की भावना : संयुक्त परिवारों के कम होते जाने और परमाणु परिवारों के बढ़ने से कई बच्चे घर में अकेले समय बिताते हैं। स्कूल से लौटने के बाद यदि घर में कोई बड़ा सदस्य मौजूद न हो तो बच्चों में अकेलेपन की भावना विकसित हो सकती है। यह स्थिति लंबे समय में मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।
3. स्क्रीन पर बढ़ती निर्भरता : समय की कमी का सबसे बड़ा प्रभाव डिजिटल उपकरणों के बढ़ते उपयोग के रूप में दिखाई देता है। मोबाइल फोन, वीडियो गेम, सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म बच्चों के प्रमुख साथी बनते जा रहे हैं। कई परिवारों में स्क्रीन बच्चों को व्यस्त रखने का माध्यम बन गई है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि अत्यधिक स्क्रीन उपयोग से ध्यान क्षमता, नींद और सामाजिक व्यवहार प्रभावित हो सकते हैं।
4. व्यवहार संबंधी चुनौतियाँ : अध्ययन बताते हैं कि जिन बच्चों को परिवार के साथ नियमित संवाद और सहभागिता मिलती है, उनमें आत्मविश्वास अधिक होता है। इसके विपरीत, संवाद की कमी कई बार चिड़चिड़ापन, गुस्सा, असुरक्षा और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याओं को जन्म दे सकती है।
क्या केवल समय की मात्रा ही महत्वपूर्ण है?
विशेषज्ञों का उत्तर है नहीं। बच्चों के विकास में ‘क्वालिटी टाइम’ यानी गुणवत्तापूर्ण समय अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि माता-पिता प्रतिदिन केवल एक घंटा भी बच्चों के साथ पूरी एकाग्रता से बिताते हैं, उनकी बातें सुनते हैं, खेलते हैं या पढ़ाई में सहयोग करते हैं, तो उसका प्रभाव कई घंटों की औपचारिक उपस्थिति से अधिक हो सकता है।
परिवार के साथ समय बिताने के लाभ
1-संवाद बेहतर होता है
2-आत्मविश्वास बढ़ता है
3-शैक्षणिक प्रदर्शन सुधरता है
4-मानसिक स्वास्थ्य मजबूत होता है
विशेषज्ञों के सुझाव
साथ भोजन करें : दिन में कम से कम एक बार पूरा परिवार साथ बैठकर भोजन करें। यह संवाद का सबसे सरल और प्रभावी माध्यम माना जाता है।
मोबाइल-मुक्त समय तय करें : घर में प्रतिदिन कुछ समय ऐसा निर्धारित किया जाए जब सभी सदस्य मोबाइल और टीवी से दूर रहें।
बच्चों की बात सुनें : सिर्फ सलाह देने के बजाय बच्चों की बातें ध्यान से सुनना भी उतना ही आवश्यक है।
सप्ताहांत परिवार के नाम : सप्ताह में एक दिन परिवार के साथ किसी गतिविधि, भ्रमण या खेल के लिए निर्धारित किया जा सकता है।
सोने से पहले संवाद : विशेषज्ञों के अनुसार, सोने से पहले 15-20 मिनट की बातचीत बच्चों के भावनात्मक विकास के लिए अत्यंत लाभकारी होती है।
तकनीक और आर्थिक विकास ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इसके साथ नई सामाजिक चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। बच्चों को अच्छी शिक्षा, बेहतर सुविधाएँ और सुरक्षित भविष्य देना आवश्यक है, परंतु उनसे भी अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें समय, स्नेह और संवाद देना। बच्चों के लिए माता-पिता केवल अभिभावक नहीं, बल्कि पहले शिक्षक, मार्गदर्शक और मित्र भी होते हैं। इसलिए समय की गुणवत्ता और पारिवारिक संवाद को प्राथमिकता देना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है।
कामकाजी परिवार और बच्चे
1.शहरी परिवारों में माता-पिता बच्चों को औसतन 1-3 घंटे प्रतिदिन दे पाते हैं।
2.कई बच्चे प्रतिदिन 3-5 घंटे तक स्क्रीन का उपयोग करते हैं।
3.विशेषज्ञ प्रतिदिन कम से कम 30-60 मिनट गुणवत्तापूर्ण पारिवारिक समय की सलाह देते हैं।
4.साथ भोजन करने वाले परिवारों में बच्चों का भावनात्मक जुड़ाव अधिक पाया गया है।
5.संवाद और सहभागिता बच्चों के आत्मविश्वास तथा मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाते हैं।
आज की सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि माता-पिता बच्चों से प्रेम कम करते हैं, बल्कि यह है कि व्यस्त जीवनशैली के बीच उस प्रेम को समय में कैसे बदला जाए। आने वाले वर्षों में सफल समाज वही होगा जो आर्थिक प्रगति के साथ-साथ परिवार और बच्चों के लिए समय बचाने की संस्कृति भी विकसित कर सके।
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

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