वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले दस वर्षों में हुई लगभग पूरी गर्मी मानव गतिविधियों की वजह से हुई है। यूरोपीय मौसम पूर्वानुमान केंद्र की Copernicus Climate Change Service से जुड़ी डॉ. सामंथा बर्गेस कहती हैं कि पिछले दशक की लगभग पूरी गर्मी इंसानों द्वारा पैदा की गई है। उनके मुताबिक इसके असर दुनिया भर में लोगों की आजीविका और पारिस्थितिक तंत्र पर दिखाई देने लगे हैं और तापमान बढ़ने के साथ ये प्रभाव और तेज़ होंगे। रिपोर्ट बताती है कि मानवजनित गर्मी बढ़ने की दर अभी भी लगभग 0.27 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक बनी हुई है। इसके पीछे रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी ग्रीनहाउस गैसें हैं। ब्रिटेन के मौसम विभाग के वैज्ञानिक डॉ. मैट पामर कहते हैं कि मामला बेहद सीधा है। हम पहले से कहीं ज़्यादा ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में छोड़ रहे हैं। इससे वातावरण अधिक गर्मी रोक रहा है और पृथ्वी का संतुलन बिगड़ रहा है। इस अतिरिक्त गर्मी का असर सिर्फ़ तापमान तक सीमित नहीं है। समुद्र भी तेजी से बदल रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2025 तक वैश्विक समुद्र स्तर 1901 की तुलना में 23 सेंटीमीटर बढ़ चुका है। समुद्र स्तर बढ़ने की रफ्तार भी तेज़ हो रही है। Royal Netherlands Institute for Sea Research की डॉ. एमी स्लांगेन कहती हैं कि यह बदलाव छोटा लग सकता है, लेकिन इससे दुनिया के निचले तटीय इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है और लोगों की आजीविका प्रभावित हो रही है।
महासागरों में एक और बदलाव दर्ज किया गया है। रिपोर्ट में पहली बार समुद्री ऊष्मा लहरों को भी शामिल किया गया है। 2025 में दुनिया ने 65 दिन ऐसे देखे जब समुद्र में अत्यधिक गर्मी की स्थिति बनी रही। दक्षिण कोरिया की पुसान नेशनल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर जून-यी ली कहती हैं कि 1991 के बाद से समुद्री ऊष्मा लहरों वाले दिनों की संख्या तीन गुना से अधिक बढ़ चुकी है। इसका असर समुद्री जीवन, मत्स्य उत्पादन, तटीय अर्थव्यवस्थाओं और मौसम प्रणालियों पर पड़ रहा है। रिपोर्ट का एक और आंकड़ा दुनिया के सामने समय की गंभीरता रखता है। यदि दुनिया को वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर रखना है, तो 2026 की शुरुआत में उपलब्ध शेष कार्बन बजट केवल 130 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड रह गया है। मौजूदा उत्सर्जन दर पर यह बजट लगभग तीन वर्षों में समाप्त हो सकता है। यानी जलवायु परिवर्तन की घड़ी सिर्फ़ चल नहीं रही। वह तेज़ी से आगे बढ़ रही है। दुनिया लंबे समय तक तापमान के आंकड़ों पर बहस करती रही। लेकिन यह रिपोर्ट एक अलग कहानी सुनाती है। यह सिर्फ़ इस बारे में नहीं है कि धरती कितनी गर्म हो चुकी है। यह इस बारे में है कि धरती कितनी तेज़ी से गर्म हो रही है। और शायद यही वह सवाल है जो आने वाले वर्षों में तय करेगा कि दुनिया जलवायु संकट को नियंत्रित कर पाएगी या उसके पीछे दौड़ती रह जाएगी।

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