गांव की निवासी रामरती देवी कहती हैं, "हमें मजबूरी में सड़क पर ही घर के नाले का रास्ता खोलना पड़ा क्योंकि नाले की निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है। अगर नाली बनी होती तो कौन चाहता कि उसके घर का गंदा पानी सामने सड़क पर बहे?" रामरती देवी की यह बात कहीं न कहीं यह एहसास कराती है कि कई बार लोग जानबूझकर गंदगी नहीं फैलाते, बल्कि व्यवस्था की कमी उन्हें ऐसा करने के लिए विवश कर देती है। इसलिए केवल लोगों को दोष देना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यक है कि बुनियादी सुविधाओं और नागरिक जागरूकता, दोनों पर समान रूप से काम किया जाए। गांव के 47 वर्षीय अनिल बताते हैं कि “यह समस्या केवल गंदगी तक सीमित नहीं रहती। कई बार पानी बहते-बहते दूसरे लोगों के दरवाजे तक पहुंच जाता है। इसी बात को लेकर गांव में लोगों के बीच झगड़े भी हो जाते हैं। छोटी-सी बात धीरे-धीरे आपसी विवाद का कारण बन जाती है।" यह स्थिति बताती है कि जहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव होता है, वहां छोटे-छोटे संसाधनों को लेकर तनाव और विवाद बढ़ने लगते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि गंदा और ठहरा हुआ पानी डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया, दस्त और अन्य जल जनित तथा वेक्टर जनित बीमारियों के फैलने का प्रमुख कारण बन सकता है। विशेष रूप से बच्चों और बुजुर्गों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम होने के कारण वे सबसे पहले इसकी चपेट में आते हैं। इसलिए जल निकासी की व्यवस्था केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत सरकार के स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण में गांवों के मूल्यांकन के दौरान केवल शौचालयों की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन, स्वच्छ सार्वजनिक स्थान, नालियों की व्यवस्था और सामुदायिक स्वच्छता जैसे मानकों को भी महत्व दिया जाता है। इसी प्रकार जल शक्ति मंत्रालय द्वारा भी ग्रामीण क्षेत्रों में तरल अपशिष्ट प्रबंधन को स्वच्छ और स्वस्थ गांव की अनिवार्य आवश्यकता माना गया है। यदि गांवों में गंदे पानी की निकासी की उचित व्यवस्था नहीं होगी, तो इसका असर न केवल लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ेगा बल्कि स्वच्छता संबंधी मूल्यांकन और रैंकिंग में भी गांव तथा पंचायत पिछड़ सकते हैं।
दरअसल, स्वच्छता केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है और न ही यह केवल नागरिकों का दायित्व है। यह दोनों के साझा प्रयास से ही संभव है। पंचायतों को सड़क निर्माण के साथ नालियों और जल निकासी की वैज्ञानिक व्यवस्था को भी प्राथमिकता देनी होगी। वहीं ग्रामीणों को भी यह समझना होगा कि घर का गंदा पानी सार्वजनिक सड़क पर बहाना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। यदि गांव स्तर पर नियमित बैठकें आयोजित हों, स्वच्छता समितियां सक्रिय हों और लोग सामूहिक रूप से समाधान तलाशें, तो इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि गांवों में जल निकासी को विकास योजनाओं का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए। नई सड़क बनने से पहले या उसके साथ नालियों की योजना तैयार हो। जहां संभव हो, वहां सोख्ता गड्ढे, सामुदायिक ड्रेनेज व्यवस्था और वर्षा जल प्रबंधन जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाए। पंचायत स्तर पर नियमित सफाई, नालियों की देखरेख और लोगों के बीच स्वच्छता के प्रति व्यवहार परिवर्तन पर भी काम करने की ज़रूरत है।
खुशबू कुमारी
सीतामढ़ी, बिहार
टीम, गाँव की आवाज़
(यह लेखिका की निजी राय है)



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