सीहोर : मरीह माता पर गुप्त नवरात्रि पर श्रद्धालुओं ने दी शतचंडी यज्ञ में आहुतियां - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

सीहोर : मरीह माता पर गुप्त नवरात्रि पर श्रद्धालुओं ने दी शतचंडी यज्ञ में आहुतियां

  • नवरात्रि के नौ दिनों में मां के नौ रूपों की पूजा-अर्चना

Marih-mata-mandir-sehore
सीहोर।  प्रतिवर्ष अनुसार इस वर्ष भी शहर के विश्रामघाट मां चौसट योगिनी मरीह माता मंदिर में गुप्त नवरात्रि का पावन पर्व आस्था और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। गुरुवार को यहां पर शामिल यज्ञाचार्य, विप्रजनों और श्रद्धालुओं ने शतचंडी यज्ञ में विधि-विधान से आहुतियां दी। इस मौके पर यज्ञाचार्य पंडित मोहन शर्मा, मंदिर के व्यवस्थापक गोविंद मेवाड़ा, रोहित मेवाड़ा, संस्कार मंच के संयोजक जितेन्द्र तिवारी, आयुष गुप्ता आदि शामिल थे।


संस्कार मंच के प्रभारी मनोज दीक्षित मामा ने बताया कि मंदिर परिसर में सुबह वेद मंत्रों के द्वारा पूजा अर्चना, दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती का पाठ के अलावा शाम को साढ़े चार बजे से यज्ञ-हवन किया जाता है। मां दुर्गा की नवशक्ति का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहां ब्रह्म का अर्थ तपस्या से है। मां दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है। इनकी उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली। देवी का यह रूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है। इस देवी के दाएं हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में यह कमण्डल धारण किए हैं। पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। लंबे समय तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया। शुक्रवार को मरीह माता मंदिर में चंद्रघंटा मां की पूजा अर्चना की जाएगी।

कोई टिप्पणी नहीं: