जब लोकतंत्र की आवाज़ को पहचान की तलाश होने लगे, तब व्यवस्था को स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि कहीं सुधार की आवश्यकता तो नहीं है। पत्रकारिता लोकतंत्र का वह जीवंत दर्पण है जिसमें सत्ता स्वयं को देखती है, समाज अपनी पीड़ा व्यक्त करता है और नागरिक अपने अधिकारों की आवाज़ सुनते हैं। संसद कानून बनाती है, न्यायपालिका संविधान की रक्षा करती है और कार्यपालिका शासन चलाती है, किंतु इन तीनों के बीच जनता की आवाज़ को पहुँचाने का सबसे महत्वपूर्ण दायित्व पत्रकारिता निभाती है। इसलिए पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है। कुछ सप्ताह पूर्व "एक देश–एक पत्रकार पहचान पत्र" विषय पर प्रकाशित मेरे लेख ने अपेक्षा से कहीं अधिक व्यापक चर्चा को जन्म दिया। देश के विभिन्न राज्यों से वरिष्ठ संपादकों, ग्रामीण पत्रकारों, डिजिटल मीडिया से जुड़े युवाओं, पत्रकार संगठनों, मीडिया शिक्षकों तथा अनेक जागरूक नागरिकों के संदेश प्राप्त हुए। विचार अलग-अलग थे, लेकिन एक बात लगभग सभी ने कही—पत्रकारों की पहचान व्यवस्था पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चर्चा का समय आ गया है। कई लोगों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, तो कुछ ने आशंका भी व्यक्त की कि कहीं ऐसी कोई व्यवस्था पत्रकारिता की स्वतंत्रता को प्रभावित करने का माध्यम न बन जाए। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है। किसी भी बड़े विचार का मूल्यांकन प्रश्नों, संवाद और विमर्श से ही होता है
आज देश में पत्रकारों के लिए एक समान राष्ट्रीय पहचान व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। विभिन्न मीडिया संस्थान अपने-अपने पहचान पत्र जारी करते हैं। राज्य सरकारों की मान्यता प्रणाली अलग है। प्रेस क्लबों की सदस्यता अलग है। कई संस्थाएँ अपने स्तर पर कार्ड जारी करती हैं। इन व्यवस्थाओं की अपनी उपयोगिता है, किंतु पूरे देश में मान्य कोई एक समान पहचान प्रणाली नहीं है। इसका सबसे अधिक प्रभाव उन पत्रकारों पर पड़ता है जो छोटे शहरों, सीमावर्ती क्षेत्रों और ग्रामीण भारत में कार्य करते हैं। प्राकृतिक आपदा हो, चुनाव हो, राष्ट्रीय कार्यक्रम हो या किसी दूसरे राज्य में रिपोर्टिंग—अक्सर उन्हें अपनी पहचान बार-बार सिद्ध करनी पड़ती है। यह प्रश्न किसी सुविधा का नहीं, बल्कि कार्य की सुगमता और विश्वसनीयता का है।
इस पूरे विमर्श में सबसे अधिक चिंता उन पत्रकारों की है जो महानगरों से दूर काम करते हैं। गाँवों और कस्बों में कार्यरत पत्रकार अक्सर सीमित संसाधनों में शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, पंचायत, पर्यावरण, सड़क, पेयजल और स्थानीय प्रशासन जैसे विषयों को सामने लाते हैं। वे लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करते हैं, लेकिन अनेक बार उनकी अपनी पहचान ही विवाद का विषय बन जाती है। क्या ऐसे पत्रकारों के लिए कोई ऐसी व्यवस्था विकसित की जा सकती है जो उन्हें सम्मानजनक, सत्यापित और पारदर्शी पहचान प्रदान करे? यही प्रश्न इस पूरे प्रस्ताव का मूल है। यह भी एक वास्तविकता है कि समय-समय पर विभिन्न राज्यों में ऐसे मामले सामने आते हैं जिनमें कुछ लोग स्वयं को पत्रकार बताकर अनुचित लाभ लेने का प्रयास करते हैं। ऐसे मामलों से वास्तविक पत्रकारों की छवि को भी नुकसान पहुँचता है। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि समस्या पत्रकारिता नहीं, बल्कि पहचान के दुरुपयोग की है। यदि पहचान का कोई अधिक विश्वसनीय, पारदर्शी और तकनीक-सक्षम मॉडल विकसित हो सके, तो इससे वास्तविक पत्रकारों और प्रशासन—दोनों को सुविधा मिल सकती है।
यदि भारत आज विश्व की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, डिजिटल गवर्नेंस की दिशा में नए मानक स्थापित कर रहा है और "विकसित भारत–2047" का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, तो स्वाभाविक है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की संस्थागत मजबूती पर भी गंभीर विचार हो। पत्रकार केवल समाचारों के वाहक नहीं होते, वे लोकतंत्र की धड़कनों को शब्द देते हैं। इसलिए उनकी विश्वसनीय पहचान का प्रश्न भी किसी एक पेशे का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती का प्रश्न है। इस नीति प्रस्ताव की पूरी अवधारणा पाँच मूल सिद्धांतों पर आधारित है— पहला, यदि भविष्य में कोई पहचान व्यवस्था बने तो उसकी पात्रता स्पष्ट, सार्वजनिक और समान हो। दूसरा, पूरी प्रक्रिया डिजिटल, पारदर्शी और समयबद्ध हो, ताकि अनावश्यक विवेकाधिकार या भ्रम की स्थिति न रहे। तीसरा, हर निर्णय के विरुद्ध स्वतंत्र अपील व्यवस्था हो, जिससे किसी पात्र पत्रकार के साथ अन्याय न हो। चौथा, पत्रकारों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता हो और उसका उपयोग केवल वैध प्रशासनिक उद्देश्यों तक सीमित रहे। पाँचवाँ और सबसे महत्वपूर्ण, किसी भी व्यवस्था का उपयोग पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर नियंत्रण के लिए नहीं किया जा सके। पहचान का उद्देश्य केवल पहचान हो—विचारों का मूल्यांकन नहीं।
भारत की पत्रकारिता का वास्तविक चेहरा केवल महानगरों के न्यूज़रूम नहीं हैं। वह छोटे कस्बों के संवाददाता, सीमावर्ती क्षेत्रों के रिपोर्टर और गाँवों में काम करने वाले वे पत्रकार हैं जो बिना संसाधनों के भी स्थानीय समस्याओं को राष्ट्रीय विमर्श तक पहुँचाते हैं। कई बार वही पत्रकार किसी सड़क, पुल, अस्पताल, विद्यालय या भ्रष्टाचार के मामले को उजागर करते हैं, जिसके बाद प्रशासन हरकत में आता है। यदि भविष्य में कोई राष्ट्रीय पहचान प्रणाली विकसित होती है, तो उसका सबसे बड़ा लाभ इन्हीं पत्रकारों तक पहुँचना चाहिए। यह व्यवस्था महानगरों के लिए नहीं, बल्कि भारत के अंतिम गाँव तक काम करने वाले पत्रकार के लिए भी समान रूप से उपयोगी होनी चाहिए। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), डीपफेक और फर्जी डिजिटल सामग्री ने सूचना की विश्वसनीयता को नई चुनौती दी है। ऐसे समय में तकनीक का उपयोग पारदर्शिता बढ़ाने के लिए होना चाहिए, न कि स्वतंत्रता सीमित करने के लिए। इसलिए क्यूआर कोड आधारित डिजिटल सत्यापन, समयबद्ध प्रक्रिया, सुरक्षित डेटाबेस और आधुनिक तकनीक के उपयोग की बात कही गई है। लेकिन साथ ही स्पष्ट किया गया है कि संपादकीय स्वतंत्रता, आलोचनात्मक लेखन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।
लोकतंत्र में संवाद ही सबसे बड़ा समाधान
किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह नहीं होती कि वह कितनी जल्दी कानून बना सकता है, बल्कि यह होती है कि वह कानून बनाने से पहले कितनी गंभीरता से समाज की बात सुनता है। यही कारण है कि यह निष्कर्ष की घोषणा नहीं करता, बल्कि संवाद का निमंत्रण देता है। यदि इस विषय पर संसद में चर्चा होती है, विश्वविद्यालयों में सेमिनार होते हैं, पत्रकार संगठन अपने सुझाव देते हैं और सरकार विशेषज्ञ समिति बनाकर सभी पक्षों से राय लेती है, तो यह स्वयं लोकतंत्र की सफलता होगी।
"एक देश–एक पत्रकार पहचान पत्र"—माँग नहीं, विचार
इस पूरे अभियान को किसी "आंदोलन" या "दबाव" के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे एक रचनात्मक नागरिक पहल के रूप में समझा जाना चाहिए। हर लोकतंत्र में समय-समय पर नागरिक नीति संबंधी सुझाव देते हैं। कुछ स्वीकार किए जाते हैं, कुछ संशोधित होते हैं और कुछ आगे की चर्चा का आधार बनते हैं। यही लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। यह भी उसी परंपरा का एक विनम्र प्रयास है।
प्रधानमंत्री से अपेक्षा क्यों?
देश में प्रशासनिक सुधारों, डिजिटल गवर्नेंस और पारदर्शिता को नई दिशा देने के अनेक प्रयास हुए हैं। ऐसे समय में यदि पत्रकारों की पहचान व्यवस्था पर भी राष्ट्रीय स्तर पर विचार-विमर्श प्रारंभ होता है, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं को और अधिक सुदृढ़ बनाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम हो सकता है। अपेक्षा किसी त्वरित निर्णय की नहीं है, बल्कि एक संवाद की शुरुआत की है।
पहचान से अधिक महत्वपूर्ण है विश्वास
पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूँजी उसका पहचान पत्र नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता है। कोई भी व्यवस्था तभी सफल होगी जब वह इस विश्वसनीयता को और मजबूत करे। "एक देश–एक पत्रकार पहचान पत्र" का विचार भी इसी भावना से प्रेरित है। इसका उद्देश्य किसी विशेष अधिकार की माँग नहीं, बल्कि एक ऐसे विषय पर राष्ट्रीय विमर्श प्रारंभ करना है जो आने वाले भारत की लोकतांत्रिक संरचना से जुड़ा है। जब देश विकसित भारत–2047 की ओर बढ़ रहा है, तब यह भी आवश्यक है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को लेकर समयानुकूल संस्थागत सुधारों पर खुले मन से चर्चा हो। यदि इस श्वेत पत्र के माध्यम से सरकार, पत्रकार समाज, शिक्षाविद्, विधि विशेषज्ञ और नागरिक समाज एक साझा मंच पर संवाद प्रारंभ करते हैं, तो यही इसकी सबसे बड़ी सफलता होगी। क्योंकि अंततः लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि विश्वास, पारदर्शिता और स्वतंत्र संवाद से चलता है। और जहाँ संवाद जीवित रहता है, वहीं लोकतंत्र सबसे अधिक सुरक्षित रहता है।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी


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