![]() |
| संजय गोस्वामी |
जन्म के एक-दो माह बाद इतना दुर्बल हो गया कि उसके बचने की आशा ही बहुत कम रह गई थी। माता-पिता इससे अत्यन्त चिन्तित हुए। उन्हें लगा कि कहीं यह बच्चा भी पहले बच्चे की तरह ही चल न बसे। इस पर लोगों ने कहा कि सम्भवत: घर में ही कोई बच्चों का रोग प्रवेश कर गया है। इसके लिए उन्होंने उपाय सुझाया। बताया गया कि एक बिल्कुल सफ़ेद खरगोश बालक के चारों ओर घुमाकर छोड़ दिया जाए। यदि बालक को कोई रोग होगा तो खरगोश तुरन्त मर जायेगा। माता-पिता बालक की रक्षा के लिए कुछ भी करने को तैयार थे, अत: ऐसा ही किया गया। आश्चर्य की बात कि खरगोश तुरन्त मर गया। इसके बाद बच्चे का स्वास्थ्य दिन पर दिन सुधरने लगा। यही बालक आगे चलकर प्रसिद्ध क्रान्तिकारी अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल के नाम से प्रसिद्ध हुआ।बिस्मिल के दादा जी नारायण लाल का पैतृक गाँव बरबाई था। यह गाँव तत्कालीन ग्वालियर राज्य में चम्बल नदी के बीहड़ों के बीच स्थित तोमरघार क्षेत्र के मुरैना जिले में था और वर्तमान में यह मध्य प्रदेश में है।
18 वर्ष की आयु में , गलत संगत में पड़ गए एवं सिगरेट पीना, भाँग पीना, इत्यादि नशा करना शुरू कर दिया। लेकिन आर्य समाज के संपर्क में आकर ग़लत आदतों से बच गए और मातृभूमि से प्रेम हो गया और उसके बाद उन्होंने उर्दू भाषा में मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण न होने पर अंग्रेजी पढ़नी शुरू की। साथ ही पड़ोस के एक पुजारी ने रामप्रसाद को पूजा-पाठ की विधि बतानी शुरू की। पुजारी के उपदेशों के कारण रामप्रसाद पूजा-पाठ के साथ ब्रह्मचर्य का पालन करने लगे।इससे उनके शरीर में अप्रत्याशित परिवर्तन हो चुका था, वह नियमित पूजा-पाठ में समय व्यतीत करने लगे थे। एक दिन उनकी मुलाकात मुंशी इन्द्रजीत से हुई। जिन्होंने रामप्रसाद को आर्य समाज के सम्बन्ध में बताया और स्वामी दयानन्द सरस्वती की लिखी पुस्तक “सत्यार्थ प्रकाश” को पढ़ने की प्रेरणा दी। उस पुस्तक के गम्भीर अध्ययन से रामप्रसाद के जीवन पर आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ा।
वर्ष 1915 में, जब उन्हें आर्य समाज के संस्थापक भाई परमानन्द की फाँसी का समाचार मिला तो उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य को नष्ट करने की प्रतिज्ञा ली। रामप्रसाद ने पं॰ गेंदालाल दीक्षित के मार्गदर्शन में मातृवेदी नामक एक संगठन का गठन किया। इस संगठन की ओर से एक इश्तिहार और एक प्रतिज्ञा भी प्रकाशित की गई। संगठन के लिए धन एकत्र करने के उद्देश्य से रामप्रसाद ने जून 1918 में दो तथा सितम्बर 1918 में एक; कुल मिलाकर तीन डकैतियां डालीं। मैनपुरी डकैती में शाहजहाँपुर के तीन युवक शामिल थे, जिनके सरदार रामप्रसाद बिस्मिल थे, किन्तु वे पुलिस के हाथ नहीं आए, वह तत्काल फरार हो गए। जिसके चलते स्थानीय पुलिस द्वारा उनके खिलाफ गिरफ्तारी का नोटिस जारी किया गया।पं॰ गेंदालाल दीक्षित ने मैनपुरी षडयन्त्र में बिस्मिल के मार्गदर्शन में 7 मार्च 1925 को बिचपुरी और 24 मई 1925 को द्वारकापुर में दो राजनीतिक डकैतियां डालीं। परन्तु उन्हें कुछ विशेष धन प्राप्त नहीं हो सका। इन दोनों डकैतियों में एक-एक व्यक्ति की मौके पर ही मृत्यु हो गई थी। अन्ततः उन्होंने यह निश्चय किया कि वे अब केवल सरकारी खजाना ही लूटेंगे,क्योंकि ऐ खजाना भारत के शोषित मजदूर व किसने के अवैध रूप से थोपे गए कर थे अतः ऐ शोषण उन्हें बिलकुल पसन्द नहीं था किसी भी रईस के घर डकैती बिल्कुल न डालेंगे। 9 अगस्त 1925 को बिस्मिल के नेतृत्व में कुल 10 लोगों ने काकोरी रेलवे स्टेशन से सरकारी खजाने की लूट की।
ब्रिटिश सरकार ने इस ट्रेन डकैती को गम्भीरता से लेते हुए, इसकी जाँच डी॰ आई॰ जी॰ के सहायक (सी॰ आई॰ डी॰ इंस्पेक्टर) मिस्टर आर॰ ए॰ हार्टन को सौंप दी।वर्ष 1916 के कांग्रेस अधिवेशन में स्वागताध्यक्ष पं॰ जगत नारायण ‘मुल्ला’ के आदेश की धज्जियाँ बिखेरते हुए, रामप्रसाद ने जब लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की पूरे लखनऊ शहर में शोभायात्रा निकाली, तो सभी नवयुवकों का ध्यान उनकी दृढता की ओर आकर्षित हुआ।बिस्मिल की एक विशेषता यह भी थी कि वे किसी भी स्थान पर अधिक दिनों तक ठहरते नहीं थे।पलायन के दिनों में, उन्होंने वर्ष 1918 में प्रकाशित अंग्रेजी पुस्तक “दि ग्रेण्डमदर ऑफ रसियन रिवोल्यूशन” का हिन्दी अनुवाद किया। बिस्मिल ने शाहजहाँपुर में “भारत सिल्क मैनुफैक्चरिंग कंपनी” में एक प्रबंधक के रूप में कार्य किया। उसके बाद उन्होंने सदर बाजार में बनारसीलाल के साथ रेशमी साड़ियों का व्यापार करना शुरू किया।वर्ष 1921 में, उन्होंने अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव पर मौलाना हसरत मोहनी का भरपूर समर्थन किया था। जिसके चलते पूर्ण स्वराज को पारित किया गया।वर्ष 1922 में, चौरीचौरा कांड के पश्चात किसी से परामर्श किए बिना ही जब महात्मा गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया था, तब गया कांग्रेस में बिस्मिल व उनके साथियों द्वारा गांधी जी का ऐसा विरोध किया गया कि कांग्रेस दो विचारधाराओं में बंट गई – एक उदारवादी या लिबरल और दूसरी विद्रोही या रिबेलियन।6 अप्रैल 1927 को विशेष सेशन जज ए० हैमिल्टन ने 115 पृष्ठ के निर्णय में प्रत्येक क्रान्तिकारी पर लगाए गए आरोपों पर विचार करते हुए लिखा कि यह कोई साधारण ट्रेन डकैती नहीं, अपितु ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने की एक सोची समझी साजिश है। हालाँकि इनमें से कोई भी अभियुक्त अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए इस योजना में शामिल नहीं हुआ, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य को ध्वस्त करने के लिए शामिल हुआ।
उन्हें मैनपुरी षड्यन्त्र और काकोरी कांड में दोषी पाते हुए सेशन जज ए० हैमिल्टन ने फांसी की सजा सुनाई।16 दिसम्बर 1927 को बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा के आखिरी अध्याय (अन्तिम समय की बातें) को पूर्ण करके जेल से बाहर भिजवा दिया।18 दिसम्बर 1927 को राम प्रसाद की अपने माता-पिता से अन्तिम मुलाकात हुई और सोमवार 19 दिसम्बर 1927 को प्रात:काल 6 बजकर 30 मिनट पर उनको गोरखपुर जेल में फाँसी दे दी गई। राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी देते हुए उनका अंतिम संस्कार राप्ती नदी के किनारे राजघाट पर हुआ।आजादी के इस संघर्ष में राम प्रसाद बिस्मिल में क्रांतिकारीयों में एक नई उमंग भरने के लिए एक देश भक्ति गीत लिखा। राम प्रसाद बिस्मिल का गीत सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.
संजय गोस्वामी
मुंबई

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें