- चोरी के शक में रामजनम वनवासी को दी ऐसी सजा कि लौटकर घर ही नहीं पहुंच सका; वीडियो सामने आया तो खुली खौफनाक कहानी, भट्ठा मालिक समेत दो गिरफ्तार
पेड़ से बंधा मजदूर... और बरसती रही लाठियां
इस पूरी घटना की सबसे भयावह कड़ी वह वीडियो है, जिसने पुलिस की जांच का रुख बदल दिया। वीडियो में रामजनम को पेड़ से बांधकर पीटते हुए लोग दिखाई दे रहे हैं। जिस व्यक्ति ने जीवनभर मेहनत कर परिवार का पेट पालने के लिए मजदूरी की, वह उस समय बंधा हुआ था और उसके पास अपने बचाव का कोई रास्ता नहीं था। पिटाई के बाद रामजनम बेसुध हो गया। पुलिस के अनुसार, इसके बाद उसे उसकी ससुराल पहुंचाने के लिए ले जाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में उसकी मौत हो गई। आरोप है कि इसके बाद उसका शव खेत में छोड़ दिया गया।पांच दिन तक गुमशुदगी... फिर खेत में मिला शव
21 अगस्त को चोलापुर क्षेत्र में अज्ञात शव मिलने की सूचना पुलिस को मिली। शव की हालत ऐसी थी कि उसकी पहचान भी तत्काल आसान नहीं थी। बाद में परिजनों ने उसकी शिनाख्त रामजनम के रूप में की। शुरुआती जांच के बाद पोस्टमार्टम और शरीर पर मिले चोट के निशानों ने पुलिस को घटना की तह तक जाने के लिए मजबूर किया। इसी बीच सामने आए पिटाई के वीडियो ने उस कहानी को खोल दिया, जो एक अज्ञात शव मिलने से शुरू हुई थी। वीडियो के आधार पर पुलिस ने जांच आगे बढ़ाई और अजय सिंह तथा विशाल सिंह को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने दोनों के खिलाफ हत्या के मामले में कार्रवाई की है।
सवाल सिर्फ एक मजदूर की मौत का नहीं
रामजनम की मौत के साथ सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा होता है कि आखिर किसी व्यक्ति को चोरी के शक में खुद सजा देने का अधिकार किसने दे दिया? शक था तो पुलिस थी, कानून था, जांच की पूरी व्यवस्था थी। लेकिन आरोप है कि कानून की जगह लाठियों ने फैसला किया और उस फैसले की कीमत एक मजदूर को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। इस घटना को किसी जाति या समुदाय के खिलाफ सामान्यीकृत करने के बजाय एक खतरनाक सामाजिक और आपराधिक मानसिकता के रूप में देखना जरूरी है। किसी की सामाजिक हैसियत, गरीबी, पेशा या पहचान उसे कमतर इंसान नहीं बनाती। गरीब मजदूर की जिंदगी भी उतनी ही कीमती है जितनी किसी प्रभावशाली व्यक्ति की।
कानून से बड़ा कोई नहीं
रामजनम अब वापस नहीं आएगा। उसके परिवार के लिए खेत में मिला वह शव सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि पूरे घर की जिंदगी पर पड़ा ऐसा घाव है जो शायद कभी नहीं भरेगा। इस घटना का सबसे जरूरी संदेश यही है—संदेह अपराध का प्रमाण नहीं होता और भीड़, मालिक या कोई व्यक्ति अदालत नहीं बन सकता। किसी पर आरोप हो तो कानून अपना काम करे। किसी मजदूर को पेड़ से बांधकर पीटना, उसके साथ अमानवीय व्यवहार करना और उसकी जान चले जाने के बाद शव को खेत में छोड़ देना किसी भी सभ्य समाज के लिए अस्वीकार्य है। अब जरूरत सिर्फ गिरफ्तारी की नहीं, बल्कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष और गहन जांच की है। जो भी व्यक्ति इस अपराध में शामिल रहा हो, उसके खिलाफ कानून के मुताबिक कठोरतम कार्रवाई हो और रामजनम के परिवार को न्याय मिले—यही उस मजदूर के प्रति समाज की सच्ची श्रद्धांजलि होगी। एक पेड़ से बंधा रामजनम सिर्फ एक तस्वीर नहीं छोड़ गया है। वह तस्वीर हमसे पूछ रही है—क्या कानून पर भरोसा खत्म हो गया है, या हमने इंसानियत को ही पीछे छोड़ दिया है?


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें