वाराणसी : जेब से निकली बधाई, उंगलियों पर आया त्योहार; GPGT ने डिजिटल दुनिया में रचा राखी का नया रंग - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

शनिवार, 29 अगस्त 2026

वाराणसी : जेब से निकली बधाई, उंगलियों पर आया त्योहार; GPGT ने डिजिटल दुनिया में रचा राखी का नया रंग

  • 2025 में साइबर कैफे और दूसरे माध्यमों पर खर्च होते थे पैसे, इस बार मोबाइल स्क्रीन पर मुफ्त और झटपट तैयार होती रहीं शुभकामनाएं—हर हैंडल पर दिखी भारतीय पर्वों के प्रति बढ़ती डिजिटल रुचि

Digital-raksha-bandhan-varanasi
वाराणसी (सुरेश गांधी)। त्योहार वही था, भावनाएं वही थीं, रिश्तों की मिठास भी वही थी—बदला सिर्फ बधाई देने का अंदाज। रक्षाबंधन पर सोशल मीडिया की जिस भी टाइमलाइन पर नजर गई, भाई-बहन के स्नेह से सजी तस्वीरों के बीच GPGT की तैयार की गई आकर्षक शुभकामना इमेज लगातार दिखाई देती रही। ऐसा लगा मानो इस बार राखी सिर्फ कलाई पर नहीं, बल्कि मोबाइल की स्क्रीन पर भी अपनी अलग छाप छोड़ रही हो। एक समय था जब किसी त्योहार पर आकर्षक बधाई संदेश या तस्वीर तैयार कराने के लिए साइबर कैफे जाना पड़ता था। 2025 में भी बड़ी संख्या में लोग साइबर कैफे अथवा दूसरे माध्यमों से अपनी पसंद की शुभकामना बनवाते और इसके लिए पैसे खर्च करते नजर आते थे। किसी को फोटो लगवानी होती थी, किसी को नाम लिखवाना और किसी को संदेश को खास अंदाज देना होता था। लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग दिखी। जेब की जगह उंगलियां चलीं और बधाई घर बैठे तैयार हो गई। मोबाइल पर कुछ ही क्षणों में तैयार आकर्षक शुभकामना तस्वीरों ने त्योहार को सोशल मीडिया तक पहुंचाने की रफ्तार बढ़ा दी। परिवार, मित्र, रिश्तेदार ही नहीं, बल्कि दूर बैठे लोगों तक भी पर्व की शुभकामनाएं तत्काल पहुंचती रहीं।


बधाई से आगे बढ़ा डिजिटल उत्सव

GPGT की खासियत यह रही कि उसने सिर्फ बधाई देने की सुविधा नहीं दी, बल्कि त्योहार को डिजिटल अभिव्यक्ति का रंग भी दिया। रक्षाबंधन की थीम, भाई-बहन का स्नेह, भारतीय संस्कार और भावनात्मक संदेश—सब कुछ एक आकर्षक तस्वीर में समाता गया। इसका असर सोशल मीडिया पर साफ दिखाई दिया। फेसबुक से लेकर अन्य डिजिटल हैंडल तक त्योहार से जुड़ी शुभकामनाओं का सिलसिला चलता रहा। एक पोस्ट दूसरे तक पहुंचती गई और देखते ही देखते पर्व की डिजिटल रौनक बढ़ती चली गई।


पर्व की महत्ता बढ़ाने वाली तकनीक

तकनीक को अक्सर यह कहकर देखा जाता है कि वह लोगों को आपस में दूर कर रही है, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। सही इस्तेमाल हो तो वही तकनीक रिश्तों और परंपराओं को दूर तक पहुंचाने का माध्यम बन सकती है। रक्षाबंधन पर GPGT का इस्तेमाल इसी बदलाव की एक झलक रहा। जब भारतीय पर्वों की तस्वीरें, संदेश और शुभकामनाएं हजारों-लाखों डिजिटल स्क्रीन तक पहुंचती हैं तो त्योहार घर की चारदीवारी से निकलकर एक साझा सामाजिक अनुभव बन जाता है। और यही बात राष्ट्रीय पर्वों तथा देश से जुड़े आयोजनों पर और महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि डिजिटल मंच लोगों में भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रभावना से जुड़े संदेशों के प्रति रुचि बढ़ा रहे हैं तो इसे महज सोशल मीडिया का चलन नहीं, बदलती डिजिटल चेतना का संकेत भी माना जा सकता है।


एक डिजिटल सलाम तो बनता है...

GPGT को सलाम इसलिए नहीं कि उसने बधाई की तस्वीरें आसान कर दीं, बल्कि इसलिए कि उसने त्योहार को लोगों की उंगलियों तक पहुंचा दिया। कल तक जिसके लिए साइबर कैफे की कतार और जेब से पैसे निकालने पड़ते थे, आज वही भावना कुछ क्षणों में मोबाइल स्क्रीन पर आकार ले रही है। बधाई अब बनवाई नहीं जाती, महसूस की जाती है और एक क्लिक में साझा कर दी जाती है। यही रक्षाबंधन की इस डिजिटल तस्वीर का सबसे खूबसूरत पहलू है— राखी की डोर कलाई पर बंधी, लेकिन उसका संदेश स्क्रीन से स्क्रीन तक जा पहुंचा।

कोई टिप्पणी नहीं: