भारत पर 22.5 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझहोर्मुज संकट शुरू होने के छह महीने में दुनिया के फॉसिल फ्यूल आयात करने वाले देशों पर 330 अरब डॉलर से ज्यादा का अतिरिक्त खर्च पड़ा है। यानी मार्च से अगस्त 2026 के बीच देशों को हर महीने औसतन करीब 55 अरब डॉलर ज्यादा चुकाने पड़े। Centre for Research on Energy and Clean Air (CREA) की नई रिसर्च के मुताबिक, यह 1990 के Gulf War के बाद फॉसिल फ्यूल की कीमतों में आया सबसे बड़ा लंबे समय तक बना रहने वाला झटका है। CREA के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में क्लीन एनर्जी के विस्तार ने इस संकट का आर्थिक असर कुछ हद तक कम किया। अगर 2020 के बाद जोड़ी गई क्लीन पावर क्षमता नहीं होती, तो फॉसिल फ्यूल के आयात का बिल करीब 36 अरब डॉलर और ज्यादा होता। होर्मुज संकट 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों के बाद शुरू हुआ। इसके बाद वैश्विक समुद्री परिवहन में लगातार आए व्यवधान ने तेल और गैस बाजारों को प्रभावित किया। यह अनुमान समुद्र के रास्ते आने वाले तेल और गैस की वास्तविक बाजार कीमतों और युद्ध से पहले बाजार में अनुमानित कीमतों के बीच अंतर के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें बढ़ी हुई माल ढुलाई, युद्ध जोखिम बीमा और दूसरी अतिरिक्त लागतों को शामिल नहीं किया गया है। इसलिए CREA का अनुमान वास्तविक कुल लागत से कम हो सकता है।
क्रूड ऑयल से ज्यादा बढ़ीं रिफाइंड फ्यूल की कीमतें
अतिरिक्त खर्च में सबसे बड़ी हिस्सेदारी क्रूड ऑयल की रही। क्रूड ऑयल के लिए देशों को करीब 164 अरब डॉलर ज्यादा चुकाने पड़े। इसकी कीमत युद्ध से पहले बाजार की उम्मीदों के मुकाबले औसतन 35 प्रतिशत ज्यादा रही। लेकिन रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था में इस्तेमाल होने वाले रिफाइंड फ्यूल की कीमतों में इससे भी ज्यादा बढ़ोतरी हुई। डीजल और गैसोइल की कीमतें 59 प्रतिशत बढ़ीं। इससे करीब 74 अरब डॉलर का अतिरिक्त खर्च हुआ। गैसोलीन की कीमत 43 प्रतिशत बढ़ी और इसके चलते करीब 36 अरब डॉलर अतिरिक्त चुकाने पड़े। एलएनजी की कीमतों में अटलांटिक बेसिन में 60 प्रतिशत और पैसिफिक बेसिन में 75 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई। इससे करीब 38 अरब डॉलर का अतिरिक्त खर्च आया वहीं जेट फ्यूल की कीमत 59 प्रतिशत बढ़ी। इससे करीब 20 अरब डॉलर का अतिरिक्त बिल बना।
डीजल की महंगाई का असर पेट्रोल पंप से कहीं आगे
डीजल की कीमतों का असर सिर्फ वाहन चलाने की लागत तक सीमित नहीं रहता। उद्योग, माल ढुलाई और खेती जैसे कई क्षेत्र डीजल पर काफी निर्भर हैं। इसलिए डीजल महंगा होने पर सामान और सेवाओं की कीमतों पर भी दबाव बढ़ता है। CREA के विश्लेषण में शामिल 170 देशों में से 134 देशों ने युद्ध से पहले बाजार में अनुमानित कीमतों से ज्यादा कीमत पर डीजल खरीदा। छह में से पांच महीनों में डीजल का युद्ध प्रीमियम 55 प्रतिशत से ऊपर रहा। जून में यह घटकर 43 प्रतिशत हुआ, लेकिन अगस्त में फिर बढ़कर 65 प्रतिशत हो गया। दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक अमेरिका भी इस संकट से पूरी तरह नहीं बच पाया। 17 अगस्त वाले सप्ताह में अमेरिका में डीजल की औसत कीमत 5.57 डॉलर प्रति गैलन पहुंच गई। यह 2022 के बाद सबसे ज्यादा कीमत है और उस साल दर्ज रिकॉर्ड के करीब है।
क्लीन एनर्जी ने बचाए 36 अरब डॉलर
CREA के मुताबिक, फॉसिल फ्यूल की बढ़ती कीमतों से किसी देश को कितना झटका लगेगा, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि उसके ऊर्जा मिश्रण में क्लीन पावर की हिस्सेदारी कितनी है। 2020 के बाद जोड़ी गई क्लीन पावर क्षमता ने संकट के शुरुआती पांच महीनों में फॉसिल फ्यूल आयात करने वाले देशों को करीब 36 अरब डॉलर के कोयला, गैस और तेल आयात से बचाया। इसमें करीब 10.6 अरब डॉलर की बचत सीधे युद्ध की वजह से हुई। यानी सामान्य परिस्थितियों में जिन फॉसिल फ्यूल की जरूरत नहीं पड़ी, उनसे आयात लागत पहले ही बच रही थी। संकट के दौरान इन ईंधनों की कीमतें बढ़ने पर अतिरिक्त फायदा यह हुआ कि इन देशों को उस महंगी कीमत पर भी उन्हें खरीदना नहीं पड़ा। CREA के ऊर्जा विश्लेषक Luke Wickenden के मुताबिक, तेल और गैस की कीमतें लंबे समय से घरेलू अर्थव्यवस्था और वैश्विक अर्थव्यवस्था दोनों के लिए जोखिम रही हैं। उनके मुताबिक, क्लीन एनर्जी में निवेश को ऊर्जा सुरक्षा में निवेश के तौर पर भी देखा जाना चाहिए।
इलेक्ट्रिक गाड़ियों से भी घट रही तेल की निर्भरता
फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता कम करने में सिर्फ क्लीन बिजली की भूमिका नहीं है। परिवहन और हीटिंग जैसे क्षेत्रों का विद्युतीकरण भी तेल की मांग घटा रहा है। International Energy Agency यानी IEA के Global EV Outlook 2025 के मुताबिक, दुनिया में इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती संख्या 2030 तक रोजाना करीब 50 लाख बैरल तेल की खपत को खत्म कर सकती है। यह मात्रा लगभग उतनी ही है, जितना क्रूड ऑयल सऊदी अरब फिलहाल होर्मुज जलडमरूमध्य को बायपास करने वाली अपनी East-West Yanbu पाइपलाइन से भेजता है।
गरीब देशों पर पड़ा ज्यादा बोझ
अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों के बाद तेल और गैस की बढ़ी कीमतों का बोझ गरीब देशों पर ज्यादा पड़ा। CREA के मुताबिक, निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों ने 2024 की अपनी जीडीपी का औसतन 1 प्रतिशत अतिरिक्त फॉसिल फ्यूल लागत पर खर्च किया। इसके मुकाबले उच्च आय वाले देशों पर यह बोझ 0.45 प्रतिशत रहा।CREA के Luke Wickenden के मुताबिक, अमीर देशों के लिए कुछ समय तक बढ़ी कीमतों को सहना संभव है। लेकिन कम आय वाले देश ईंधन की कीमतों में ऐसे उछाल के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं। जिन देशों ने पहले ही इलेक्ट्रिक वाहनों और क्लीन एनर्जी के जरिए फॉसिल फ्यूल की जरूरत कम कर ली है, वे ऐसे संकट के असर से कुछ हद तक बच सकते हैं।
भारत पर 22.5 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ
CREA के आंकड़ों में भारत उन देशों में दूसरे स्थान पर है, जिन्हें इस अवधि में सबसे ज्यादा अतिरिक्त फॉसिल फ्यूल आयात लागत उठानी पड़ी। मार्च से अगस्त 2026 के बीच भारत का अतिरिक्त फॉसिल फ्यूल आयात खर्च करीब 22.5 अरब डॉलर रहा। इस सूची में चीन सबसे ऊपर है, जिस पर करीब 35.5 अरब डॉलर का अतिरिक्त खर्च आया। अमेरिका 16.5 अरब डॉलर के साथ तीसरे स्थान पर रहा। सबसे ज्यादा अतिरिक्त लागत उठाने वाले 10 देशों में चीन, भारत, अमेरिका, नीदरलैंड्स, दक्षिण कोरिया, इटली, जापान, फ्रांस, स्पेन और मिस्र शामिल हैं।
CREA ने कैसे निकाला यह अनुमान?
CREA ने मार्च से अगस्त 2026 के बीच समुद्र के रास्ते आयात किए गए क्रूड ऑयल, फ्यूल और गैस की वास्तविक कीमतों की तुलना युद्ध से पहले बाजार में तय कीमतों से की। इसके लिए हमलों से पहले के 12 दिनों की फ्यूचर्स कर्व को आधार बनाया गया। इस अवधि में बाजार 2026 के हर डिलीवरी महीने के लिए कीमतों का अनुमान लगा चुका था। इसलिए CREA के मुताबिक यह उसका बनाया हुआ कोई पूर्वानुमान नहीं है। तुलना बाजार की अपनी युद्ध-पूर्व उम्मीद और युद्ध के बाद की वास्तविक कीमतों के बीच है। मार्च से जुलाई के वास्तविक आयात की मात्रा Kpler के जहाजों की आवाजाही पर आधारित आंकड़ों से ली गई है। यह कुल 281.7 अरब डॉलर के आयात को कवर करती है। अगस्त का आंकड़ा करीब 15 प्रतिशत है। इसे मॉडल के जरिए निकाला गया है क्योंकि समुद्री परिवहन के आंकड़ों को अंतिम रूप मिलने में कुछ सप्ताह लगते हैं। विश्लेषण तैयार किए जाने तक अगस्त के सिर्फ पांच कारोबारी दिनों के आंकड़े उपलब्ध थे। इस विश्लेषण में 170 देशों को शामिल किया गया है। इसमें पाइपलाइन गैस, कोयला, फ्यूल ऑयल और नैफ्था को शामिल नहीं किया गया है। माल ढुलाई, युद्ध जोखिम बीमा और दूसरी ऐसी लागतें भी इसमें शामिल नहीं हैं। इसके अलावा, आंकड़े उन फॉसिल फ्यूल पर आधारित हैं जिन्हें देशों ने वास्तव में खरीदा। कीमत बढ़ने के कारण मांग में जो कमी आई, उसे अलग से नहीं जोड़ा गया है। ईंधन की ऊंची कीमत या कमी के कारण लोगों और अर्थव्यवस्थाओं को जो नुकसान हुआ, वह भी इस अनुमान में शामिल नहीं है। CREA के मुताबिक, इन सभी सीमाओं का असर अनुमान को बढ़ाने के बजाय कम करने वाला है। इसलिए 330 अरब डॉलर से ज्यादा का अतिरिक्त खर्च एक संयमित अनुमान है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें