आज का विष कैसा है?
आज समाज अनेक प्रकार के विष से घिरा है, जैसे-
1.सोशल मीडिया पर झूठी खबरें और नफरत फैलाने वाले संदेश।
2.छोटी-छोटी बातों पर हिंसा और असहिष्णुता।
3.राजनीतिक कटुता का सामाजिक संबंधों पर प्रभाव।
4.परिवारों में संवाद का अभाव।
5.पर्यावरण प्रदूषण और प्रकृति का दोहन।
6.युवाओं में अवसाद, अकेलापन और मानसिक तनाव।
7.भ्रष्टाचार और नैतिक मूल्यों का हृास।
इन परिस्थितियों में जो व्यक्ति धैर्य, विवेक और संयम बनाए रखकर समाज को जोड़ने का प्रयास करता है, वही आधुनिक अर्थों में शिवत्व का पालन कर रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में देश ने अनेक ऐसी घटनाएँ देखी हैं, जहाँ धार्मिक, सामाजिक या राजनीतिक मतभेदों ने तनाव का रूप लिया। सोशल मीडिया पर अफवाहों ने कई बार वास्तविक जीवन में हिंसा को जन्म दिया। सड़क पर मामूली विवाद भी कभी-कभी गंभीर संघर्ष में बदल जाते हैं। ऐसे समय में समाज को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि समाधान का मार्ग चुनें। जो कटु भाषा का उत्तर कटुता से न दें, बल्कि विवेक और संवाद से दें। स्वामी विवेकानंद कहा करते थे, ‘शक्ति वही है जो दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझे।’ शिव का विषपान इसी करुणा का सर्वोच्च उदाहरण है। महात्मा गांधी का मानना था कि घृणा का उत्तर घृणा से नहीं दिया जा सकता। यद्यपि गांधीजी ने शिव के विषपान पर विशेष टिप्पणी नहीं की, पर उनका अहिंसा का सिद्धांत इसी भावना से जुड़ता है कि नकारात्मकता का उत्तर सकारात्मकता से दिया जाए। आध्यात्मिक गुरु स्वामी चिन्मयानंद ने कहा था कि समुद्र मंथन मनुष्य के मन का प्रतीक है। जब मन का मंथन होता है तो पहले भीतर का विष यानी क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार बाहर आता है। जो उसे नियंत्रित कर लेता है, वही आत्मविकास की ओर बढ़ता है। श्री श्री रविशंकर भी अनेक अवसरों पर कह चुके हैं कि शिव का अर्थ है असीम चेतना। भीतर के क्रोध और तनाव को साध लेना ही शिवत्व की दिशा है।
शिवरात्रि हमें क्या सिखाती है?
शिवरात्रि केवल पूरी रात जागने का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर जागने का अवसर है। यदि इस दिन हम यह संकल्प लें-मैं झूठ नहीं फैलाऊँगा। मैं कटु भाषा का प्रयोग नहीं करूँगा। मैं पर्यावरण की रक्षा करूँगा। मैं परिवार और समाज में संवाद बढ़ाऊँगा। मैं कठिन परिस्थितियों में भी संयम रखूँगा तो यही सच्ची शिवभक्ति होगी। मंदिर में जल चढ़ाना आस्था है, लेकिन किसी प्यासे को जल पिलाना शिव के संदेश को जीवन में उतारना है। बेलपत्र अर्पित करना पूजा है, लेकिन समाज से ईष्र्या, द्वेष और हिंसा का विष कम करना उससे भी बड़ी साधना है।
आज समाज को शिव क्यों चाहिए?
आज दुनिया तकनीकी रूप से जितनी विकसित हुई है, मानसिक रूप से उतनी ही बेचैन भी दिखाई देती है। सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन संतोष घटा है। संवाद बढ़ा है, पर समझ कम हुई है। ऐसे समय में शिव का संदेश केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय आवश्यकता बन गया है। आज हमें ऐसे शिक्षक चाहिएं जो छात्रों का तनाव समझें, ऐसे माता-पिता चाहिएं जो बच्चों को समय दें, ऐसे नेता चाहिएं जो समाज को जोड़ें, ऐसे पत्रकार चाहिएं जो सत्य और संतुलन का पालन करें और ऐसे नागरिक चाहिएं जो मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान करें। यही आधुनिक शिवत्व है।
भगवान शिव का विषपान केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के लिए एक शाश्वत आदर्श है। इसका अर्थ यह नहीं कि अन्याय को स्वीकार कर लिया जाए, बल्कि यह है कि समाज के हित में अपने अहंकार, क्रोध और स्वार्थ पर नियंत्रण रखा जाए तथा आवश्यकता पड़ने पर धर्म और न्याय की रक्षा के लिए साहसपूर्वक खड़ा हुआ जाए। महाशिवरात्रि हमें यही संदेश देती है कि यदि हम अपने भीतर के विष यानी क्रोध, ईष्र्या, द्वेष, असत्य और अहंकार का मंथन कर उसे नियंत्रित कर लें, तो प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में शिवत्व का स्पर्श पा सकता है। सच तो यह है कि आज समाज को मंदिरों में जितने शिव चाहिएं, उससे कहीं अधिक चरित्र में शिव चाहिएं। क्योंकि विष पीने वाला ही नहीं, बल्कि विष को समाज में फैलने से रोकने वाला ही वास्तव में शिव कहलाने का अधिकारी है।
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


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