- काशी ने की अखंड सुख-समृद्धि की कामना, मंगला आरती में बाबा विश्वनाथ को अर्पित हुई विशेष राखी
काशी की परंपरा में भगवान शिव केवल आराध्य नहीं, बल्कि काशी के लोकजीवन के संरक्षक और विश्व के कल्याणकर्ता विश्वेश्वर हैं। इसलिए रक्षाबंधन के दिन बाबा को राखी अर्पित करने की परंपरा प्रेम और संरक्षण की उस सनातन भावना को सामने लाती है, जिसमें व्यक्तिगत मंगल से आगे बढ़कर परिवार, समाज और समूची सृष्टि के कल्याण की कामना समाहित है। रक्षाबंधन पर बहनों ने जहां भाइयों की कलाई पर स्नेह और विश्वास का धागा बांधा, वहीं काशी ने अपने आराध्य विश्वेश्वर की कलाई पर राखी बांधकर मानो यही प्रार्थना की—बाबा, अपनी कृपा का यह रक्षा-सूत्र पूरी काशी और देश-दुनिया के हर प्राणी पर बनाए रखें। भोर में मंदिर के गर्भगृह से उठी यह आस्था दिन चढ़ने के साथ काशी की गलियों और घर-आंगनों तक फैलती गई। एक ओर बहनों की थालियों में सजे रोली-अक्षत और राखियां थीं तो दूसरी ओर विश्वनाथ धाम में भगवान शिव के प्रति समर्पित राखी। इस तरह रक्षाबंधन ने काशी में रिश्तों की डोर को भक्ति की डोर से जोड़ दिया। काशी का संदेश स्पष्ट था—रक्षा केवल कलाई पर बंधे धागे का संकल्प नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, जिम्मेदारी और लोकमंगल की वह भावना है, जो मनुष्य को मनुष्य से और भक्त को भगवान से जोड़ती है।

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