कोई व्यूअर सौम्या और जीत की कहानी को टेलीविजन पर अपनी रोज की व्यूइंग रूटीन का हिस्सा बनाकर देख सकता है, तो कोई इसे जियोहॉटस्टार पर अपनी सुविधा के हिसाब से, अपने समय पर देख सकता है। कंटेंट वही है, लेकिन उसे देखने का तरीका बदल गया है। और शायद एंटरटेनमेंट की दुनिया में आज सबसे दिलचस्प बदलाव यही है। अब ‘टीवी ऑडियंस’ और ‘ओटीटी ऑडियंस’ को दो अलग-अलग ग्रुप्स की तरह देखना उतना जरूरी नहीं रहा। एक ही व्यूअर अलग-अलग समय पर दोनों हो सकता है, यह बस इस बात पर निर्भर करता है कि उस वक्त वह क्या देखना चाहता है। ‘ये फितूर तेरा’ जैसे शो के लिए यही बात इसे खास बनाती है। इसकी इमोशनल स्टोरीटेलिंग टेलीविजन की उस ताकत से जुड़ी है, जहां कैरेक्टर्स और रिलेशनशिप्स को समय के साथ आगे बढ़ने की जगह मिलती है। वहीं, इसके यंग प्रोटागोनिस्ट्स, कॉलेज सेटिंग, म्यूजिक और कंटेम्परेरी रिलेशनशिप्स इसे उन व्यूअर्स के लिए भी रेलिवेंट बनाते हैं, जो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर फिक्शन देखने में कंफर्टेबल हैं। यह बदलाव स्टोरीटेलिंग को देखने का हमारा नजरिया भी बदल रहा है। अब सवाल यह नहीं है कि कोई स्टोरी टेलीविजन के लिए है या ओटीटी के लिए। सवाल यह है कि क्या वह स्टोरी ऑडियंस से जुड़ सकती है, चाहे वह उसे कहीं भी देखना पसंद करे। शायद आने वाला समय टीवी वर्सेज ओटीटी का नहीं है। यह उन स्टोरीज का समय है, जो दोनों प्लेटफॉर्म्स पर अपनी जगह बना सकें। जब प्लेटफॉर्म से ज्यादा इंपॉर्टेंट स्टोरी हो जाती है, तो आखिर में सबसे बड़ा विनर ऑडियंस ही होती है।

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