1. फॉर्म-6 में बदलाव जोशी ने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में बदलाव पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित वैधानिक फॉर्म में संबंधित नियमों में संशोधन किए बिना बदलाव नहीं किया जा सकता। संधू ने भी उनकी बात से सहमति जताई थी। बाद में निर्वाचन आयोग के ईसीआईनेट मंच पर फॉर्म-6 के ऑनलाइन संस्करण में एसआईआर से संबंधित एक घोषणा जोड़ी गई। इस पर संधू ने फिर आपत्ति जताते हुए कहा कि संबंधित नियमों में संशोधन किए बिना वैधानिक फॉर्म में बदलाव किया गया है। उन्होंने इस बदलाव को ‘‘अनधिकृत/अवैध’’ बताया और इसे हटाने की मांग की।
निर्वाचन आयोग का जवाब: आयोग ने कहा कि अतिरिक्त घोषणा को उच्चतम न्यायालय ने बरकरार रखा है। इसके तहत नए मतदाताओं को पिछले एसआईआर के दौरान तैयार मतदाता सूची में अपने, अपने माता-पिता या दादा-दादी के नाम दर्ज होने से संबंधित जानकारी देनी होती है। आयोग ने कहा कि यह घोषणा केवल एसआईआर प्रक्रिया के लिए है। एसआईआर नहीं होने की स्थिति में निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित सामान्य फॉर्म का इस्तेमाल किया जाएगा।
2. मतदाता सूची के डेटाबेस तक पहुंच संधू और जोशी ने मतदाता सूची के डेटाबेस के केंद्रीकरण और राज्यों में वैधानिक निर्वाचन अधिकारियों को उपलब्ध कराई गई उस तक पहुंच को लेकर चिंता जताई थी। जोशी ने यह सुनिश्चित करने के लिए ऑडिट कराने का प्रस्ताव दिया था कि वैधानिक अधिकारियों के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के पास डेटाबेस में बदलाव करने के लिए जरूरी ‘लॉगिन’ विवरण न हों। वहीं, संधू ने राज्य के अधिकारियों की पहुंच पर लगाई गई पाबंदियों पर सवाल उठाए थे। निर्वाचन आयोग का जवाब: आयोग ने कहा कि क्षेत्रीय अधिकारियों को उनकी वैधानिक शक्तियों के अनुरूप ईसीआईनेट तक भूमिका-आधारित पहुंच दी गई है। आयोग ने ईसीआईनेट की समीक्षा के लिए एक समिति गठित करने का फैसला किया है। इसकी अध्यक्षता एक वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त करेंगे और इसमें किसी स्वतंत्र आईआईटी या आईआईआईटी के विशेषज्ञ भी शामिल होंगे। समिति यह ‘‘दोबारा जांचेगी’’ कि ईसीआईनेट चुनाव संबंधी कानूनों और नियमों का पालन करता है या नहीं। आयोग ने कहा कि क्षेत्रीय अधिकारियों को यदि और अधिक लचीली व्यवस्था की जरूरत होगी, तो उसे लागू किया जाएगा। नए आईटी मॉड्यूल और पोर्टल को मंजूरी देने से पहले अधिकारियों की समिति में भी चर्चा की जाएगी।
3. गोवा के 97 मतदाता उच्चतम न्यायालय के एक आदेश के बाद गोवा में निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) ने ‘‘तार्किक विसंगतियों’’ के लिए चिह्नित मतदाताओं के मामलों की जांच की और 97 लोगों को मतदाता सूची में शामिल किए जाने के योग्य पाया। हालांकि, रिपोर्ट किए गए पत्राचार के अनुसार, सॉफ्टवेयर में ईआरओ के फैसले को दर्ज करने और इन मतदाताओं के नाम बहाल करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के कार्यालय ने नाम बहाल करने का विकल्प उपलब्ध कराने के लिए आठ बार अनुरोध किया, लेकिन इन मतदाताओं के नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाए।
निर्वाचन आयोग का जवाब : आयोग ने कहा कि बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) को छूटे हुए मतदाताओं के घर जाकर उनके फॉर्म एकत्र करने का निर्देश दिया गया है। इन 97 मतदाताओं में से 81 ने नाम शामिल कराने के लिए पहले ही फॉर्म-6 भर दिया है। आयोग ने यह भी फैसला किया है कि मौजूदा एसआईआर के दौरान जिन मतदाताओं को मैपिंग नहीं होने या तार्किक विसंगतियों के कारण नोटिस जारी किए गए हैं, बीएलओ उनके घर जाकर दस्तावेज एकत्र करेंगे और उन्हें ईसीआईनेट पर अपलोड करेंगे। इसके बाद ईआरओ उनके मामलों पर फैसला करेंगे। आमतौर पर ऐसे मतदाताओं को ईआरओ या सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (एईआरओ) के सामने व्यक्तिगत रूप से पेश होने की जरूरत नहीं होगी।
4. पूर्ण आयोग की मंजूरी के बिना जारी किए गए पत्र संधू ने निर्वाचन आयोग के नाम से पूर्ण आयोग की मंजूरी के बिना पत्र जारी किए जाने का मुद्दा उठाया था। बाद में जोशी ने भी इसी तरह की आपत्ति दर्ज कराई और कहा कि भविष्य में ऐसे पत्र जारी करने से पहले जरूरी मंजूरी ली जानी चाहिए।
निर्वाचन आयोग का जवाब : आयोग की प्रेस विज्ञप्ति में उसके नाम से जारी किए जाने वाले पत्रों की मंजूरी के मुद्दे पर विशेष रूप से कुछ नहीं कहा गया है। हालांकि, आयोग ने कहा कि उसकी सभी बैठकों का एजेंडा पहले से प्रसारित किया जाएगा। उसने यह भी कहा कि निर्वाचन आयुक्तों द्वारा आयोग के अधिकारियों को दिए गए सभी निर्देशों का “पूरी सावधानी से पालन किया जाएगा।’’
5. आईटी प्रभाग की निगरानी संधू और जोशी ने निर्वाचन आयोग के आईटी तंत्र में काम के बंटवारे में किए गए बदलावों को लेकर कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को पत्र लिखा था। उन्होंने उन बदलावों पर आपत्ति जताई थी, जिनके बारे में उनका कहना था कि वे उनकी जानकारी के बिना किए गए और उनसे आईटी प्रभाग की निगरानी प्रभावित हुई। निर्वाचन आयोग का जवाब: आयोग ने कहा कि काम के पुनर्वितरण से संबंधित विवादित आदेश संधू और जोशी की आपत्ति के बाद कभी लागू ही नहीं किए गए। आयोग ने यह भी कहा कि आईटी प्रभाग की निगरानी की जिम्मेदारी उप निर्वाचन आयुक्त से ‘‘वास्तव में कभी वापस नहीं ली गई थी।’’
6. मतदाताओं के नाम बहाल किए जाने के खिलाफ अपील संधू ने पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों द्वारा मतदाता सूची में शामिल किए गए लोगों के नाम हटाने की मांग वाली अपीलों पर सवाल उठाए थे। उन्होंने पूछा था कि आयोग की ओर से अपील दायर करने के लिए कौन अधिकृत था और वास्तव में ये अपीलें किसने दायर की थीं। उन्होंने दर्ज किया था कि न तो उन्हें, न जोशी को और न ही पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इन अपीलों के आधार या उन्हें दायर करने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी गई थी।
निर्वाचन आयोग का जवाब : 26 सितंबर की प्रेस विज्ञप्ति में इन अपीलों का विशेष रूप से उल्लेख नहीं किया गया है। आयोग ने कहा कि एसआईआर के दौरान या उसके बाद जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से छूट गए हैं, वे निरंतर अद्यतन प्रक्रिया के तहत नाम शामिल कराने के लिए निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) के पास आवेदन कर सकते हैं। आयोग ने मुख्य निर्वाचन अधिकारियों, जिला निर्वाचन अधिकारियों और ईआरओ को ऐसे मतदाताओं के लिए विशेष पंजीकरण अभियान चलाने का निर्देश भी दिया है।

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