वाराणसी : पानी में डूबी काशी, अब जागी मेयर की नींद! - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 8 सितंबर 2026

वाराणसी : पानी में डूबी काशी, अब जागी मेयर की नींद!

  • दो दिन में जलभराव खत्म करने का अल्टीमेटम, जेई-एई-एक्सईएन पर कार्रवाई की चेतावनी; सवाल—बारिश के बीच क्यों नहीं तय हुई जिम्मेदारी?
  • फरवरी से नाला-सफाई का दावा, फिर भी खोजवां-बिरदोपुर-शिवपुरवा में जलभराव; जनता पूछ रही—पांच साल के कार्यकाल का हिसाब सड़क देगी या फाइल?
  • कैंट ही नहीं, उत्तर और दक्षिण भी जलभराव से बेहाल—विधायक पार्टी लाइन में खामोश, जनता के आक्रोश की आहट सत्ता के गलियारों तक

Flood-varanasi
काशी में इस बार बारिश ने सिर्फ सड़कें नहीं डुबोईं, नगर निगम के दावों की भी पोल खोल दी। गलियां पानी में डूबीं, घरों के दरवाजों तक नालियों का पानी पहुंचा और जगह-जगह जलनिकासी व्यवस्था बेबस नजर आई। अब नगर निगम सदन में जब पार्षदों का गुस्सा फूटा तो महापौर ने अधिकारियों को दो दिन की मोहलत दे दी। बुधवार के बाद नगर आयुक्त, जलकल के जीएम और नगर निगम के मुख्य अभियंता को सीधे जिम्मेदार मानने तथा प्रभावित इलाकों के जेई, एई और एक्सईएन को प्रतिकूल प्रविष्टि देने की चेतावनी दी गई है। 15 दिन में नालों, सीवर चैंबरों और जलनिकासी मार्गों से अतिक्रमण हटाने का भी निर्देश हुआ है। लेकिन काशी का सवाल इससे बड़ा है— जब शहर डूब रहा था तब कार्रवाई क्यों नहीं हुई?


अब फाइलों में निकलेगा जलभराव का हिसाब?

Flood-varanasi
नगर निगम का कहना है कि फरवरी से ही नाला और सीवर लाइन की सफाई चल रही है। फिर सवाल उठता है कि अगर सफाई इतनी व्यापक थी तो खोजवां, बिरदोपुर और शिवपुरवा जैसे पुराने इलाकों में पानी क्यों जमा हुआ? क्या सफाई सिर्फ कागज पर हुई? क्या नालों की वास्तविक क्षमता जांची गई? क्या जलनिकासी के पुराने रास्तों पर हुए अतिक्रमण समय रहते हटाए गए? या फिर नगर निगम की व्यवस्था बारिश आने तक सिर्फ बैठकों और निरीक्षणों में ही तैयार होती रही? काशी अब इन सवालों का जवाब चाहती है।


मेयर साहब, जनता 'दो दिन' नहीं, पांच साल का हिसाब पूछ रही है

Flood-varanasi
दो दिन की मोहलत अच्छी बात है। कार्रवाई भी होनी चाहिए। दोषी अधिकारी हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई भी हो। लेकिन सवाल सिर्फ जेई, एई या एक्सईएन का नहीं है। सवाल राजनीतिक जवाबदेही का भी है। महापौर निर्वाचित होकर पांच साल के लिए शहर की सर्वोच्च नगरीय राजनीतिक जिम्मेदारी संभालते हैं। नगर निगम की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक महापौर और पार्षदों का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। ऐसे में जनता का सवाल बिल्कुल स्वाभाविक है— इन पांच वर्षों में काशी की जलनिकासी व्यवस्था स्थायी क्यों नहीं सुधरी?


प्रॉपर्टी बन रही या शहर?

काशी में अब एक और चर्चा जोर पकड़ रही है। लोग पूछ रहे हैं कि नगर निगम की प्राथमिकता आखिर क्या है—शहर की बुनियादी समस्याएं या सत्ता के इस कार्यकाल में अपने राजनीतिक भविष्य और निजी हितों को साधना?  महापौर या किसी जनप्रतिनिधि पर निजी संपत्ति बनाने का आरोप गंभीर है। इसलिए इसका जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, संपत्ति के सार्वजनिक रिकॉर्ड, घोषणाओं और दस्तावेजों से होना चाहिए। जनता को यह जानने का अधिकार है कि जनप्रतिनिधि की संपत्ति में कार्यकाल के दौरान क्या बदलाव हुआ, कौन-सी संपत्ति कब बनी और उसका स्रोत क्या है। अगर सब साफ है तो दस्तावेज सामने रखिए। अगर सवाल गलत हैं तो जवाब दीजिए। लोकतंत्र में इससे बेहतर सफाई कोई नहीं।


काशी का 'स्विमिंग पूल मॉडल'!

शहर में व्यंग्य अब खुद लोगों की जुबान पर है— सड़क चाहिए थी, जलाशय मिल गया। नाला चाहिए था, तालाब मिल गया। जलनिकासी चाहिए थी, घर के सामने स्विमिंग पूल मिल गया। और नगर निगम? वह अब कह रहा है—दो दिन में पानी नहीं दिखना चाहिए। काशी पूछ रही है— पानी नहीं दिखना चाहिए या समस्या नहीं रहनी चाहिए? दोनों में बहुत फर्क है। पंप लगाकर पानी हटाना राहत है। लेकिन अगली बारिश में फिर पानी न भरे—यह व्यवस्था की सफलता है।


अतिक्रमण पर 15 दिन की तलवार

नगर निगम ने 15 दिन में नालों और सीवर चैंबरों से अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया है। सदन में रोहनिया क्षेत्र के छह वार्डों में नालों और तालाबों पर कब्जे की शिकायत भी उठी। वैष्णोपुरम कॉलोनी के नाले पर अवैध निर्माण हटाने की मांग हुई। यह कार्रवाई अगर सचमुच जमीन पर होती है तो स्वागत योग्य है। लेकिन सवाल यह भी है कि इतने वर्षों से ये अतिक्रमण किसकी आंखों के सामने पनपते रहे? अतिक्रमण करने वाला दोषी है तो उसे संरक्षण देने वाला कौन? अगली बारिश फिर यही सवाल न पूछे. काशी को घोषणाएं नहीं चाहिएं। उसे ऐसी जलनिकासी चाहिए जो बारिश के समय काम करे। उसे ऐसे नाले चाहिए जिनकी सफाई बारिश से पहले हो। उसे ऐसी सड़कें चाहिएं जहां पंप लगाने की जरूरत बार-बार न पड़े। उसे ऐसा नगर निगम चाहिए जो जलभराव के बाद जिम्मेदार तलाशने के बजाय जलभराव होने ही न दे। और सबसे बड़ा सवाल— अगर अभी से जनता के बीच यह धारणा बनने लगी है कि मौजूदा कार्यकाल के बाद फिर मौका मिले या न मिले, तो क्या शासन-प्रशासन को इसे गंभीर संकेत नहीं मानना चाहिए? क्योंकि चुनाव की तारीख आने पर जनता भाषण नहीं सुनती। वह अपनी गली याद करती है। वह अपने घर में घुसा पानी याद करती है। वह अपने बच्चे को स्कूल न भेज पाने का दिन याद करती है। वह अपनी दुकान में भरा पानी याद करती है। और फिर वोट देती है।


काशी सब देख रही है

मेयर साहब! काशी बहुत पुरानी है। यहां गंगा भी सब देखती है और गलियां भी। घाटों की चमक भी जनता देखती है और गलियों का कीचड़ भी। बड़े प्रोजेक्ट भी दिखाई देते हैं और बारिश में डूबता छोटा दुकानदार भी। इसलिए अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि दो दिन में पानी निकलेगा या नहीं। सवाल यह है कि—अगली बारिश में काशी डूबेगी या नगर निगम की व्यवस्था सुधरेगी? क्योंकि इस बार पानी सिर्फ सड़कों पर नहीं आया है। नगर निगम के दावों की सतह तक भी पहुंच गया है।  


काशी की गलियां पूछेंगी वोट का हिसाब!

काशी की समस्या सिर्फ कैंट विधानसभा तक सीमित नहीं है। शहर उत्तरी हो या शहर दक्षिणी, गलियों का दर्द लगभग एक जैसा है। कहीं बारिश का पानी सड़क पर ठहरता है, कहीं नाला उफनता है और कहीं सीवर का पानी घर-दुकान तक पहुंच जाता है। नगर निगम सदन में सोमवार को जलभराव पर जिस तरह पार्षदों का आक्रोश सामने आया, उसने साफ कर दिया कि मामला अब किसी एक मोहल्ले या विधानसभा क्षेत्र का नहीं रहा।


कैंट में आवाज उठी, बाकी शहर क्यों चुप?

जलभराव का असर कैंट तक सीमित नहीं। शहर उत्तरी और शहर दक्षिणी के तमाम इलाकों में भी लोग बरसात के दिनों में जलनिकासी की समस्या से जूझते रहे हैं। लेकिन इन क्षेत्रों के निर्वाचित विधायक खुलकर नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने से क्यों बचते हैं? क्या पार्टी अनुशासन और राजनीतिक मर्यादा जनता की परेशानी से बड़ी हो गई है? यह किसी विधायक पर व्यक्तिगत आरोप नहीं, लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि की भूमिका पर स्वाभाविक सवाल है। जनता विधायक इसलिए नहीं चुनती कि वह सिर्फ अपनी पार्टी की आवाज बने। वह इसलिए चुनती है कि जरूरत पड़ने पर अपनी गली की आवाज सत्ता के सामने रख सके।


2024 ने एक संकेत दिया था?

राजनीतिक जानकारों का एक वर्ग मानता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी शहर के कई इलाकों में स्थानीय मुद्दों और बुनियादी सुविधाओं को लेकर नाराजगी ने भी मतदाताओं के व्यवहार को प्रभावित किया हो सकता है। इसे केवल जलभराव से जोड़ना सही नहीं होगा, लेकिन आंकड़ा एक राजनीतिक संकेत जरूर देता है। 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से विजयी हुए, लेकिन 2019 की तुलना में उनकी जीत का अंतर काफी घटा और मुकाबला अपेक्षाकृत अधिक कड़ा रहा। विधानसभा-वार आंकड़ों में भी अंतर दिखाई देता है। वाराणसी दक्षिण में मोदी को 53.62 प्रतिशत और कैंट में 60.68 प्रतिशत वोट मिले।


क्या इसमें स्थानीय नाराजगी की कोई भूमिका थी?

इसका वैज्ञानिक या चुनावी रूप से प्रमाणित उत्तर अलग अध्ययन का विषय है। लेकिन राजनीतिक जमीन पर सवाल जरूर उठता है— क्या लगातार बदहाल सड़कें, गलियां, जलभराव, कूड़ा और सीवर जैसी समस्याएं धीरे-धीरे वोटर के मन में असंतोष नहीं पैदा करतीं?


जनता भूलती नहीं

राजनीति में भाषण पांच साल चलते हैं, लेकिन जनता की स्मृति में पांच चीजें ज्यादा देर रहती हैं— उसकी गली। उसकी सड़क। उसका नाला। उसका सीवर। और बारिश में उसके घर में घुसा पानी। यही कारण है कि किसी भी जनप्रतिनिधि के लिए आखिरी वर्ष सिर्फ उद्घाटन और शिलान्यास का नहीं, पिछले वर्षों के काम का हिसाब देने का समय भी होता है। अगर दो दिन बाद पानी उतर गया तो क्या समस्या भी खत्म मान ली जाएगी? नहीं। क्योंकि पानी उतर जाना समाधान नहीं है। अगली बारिश में पानी न भरना समाधान है। अगर फरवरी से नाला-सीवर सफाई चल रही थी, जैसा निगम की ओर से सदन में बताया गया, तो फिर शहर के पुराने इलाकों में जलभराव क्यों हुआ? इसका जवाब किसी एक जेई को प्रतिकूल प्रविष्टि देकर पूरा नहीं होगा। जवाबदेही ऊपर तक तय करनी होगी।


'पांच साल बाद फिर मौका मिलेगा?'

काशी में एक राजनीतिक चर्चा भी धीरे-धीरे आकार ले रही है—क्या वर्तमान कार्यकाल के बाद जनता फिर वही चेहरे और वही व्यवस्था स्वीकार करेगी? इसका फैसला जनता करेगी। और यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी जनप्रतिनिधि को दोबारा मौका मिलेगा या नहीं, यह पहले से तय मान लेना राजनीति की सबसे बड़ी भूल हो सकती है। जनता का मूड पढ़ने का सबसे अच्छा तरीका किसी सर्वे से पहले उसकी गली में जाना है। वहां पता चलता है कि विकास की चमक कितनी है और व्यवस्था की सच्चाई कितनी।


विधायक भी सुनें, सिर्फ मेयर नहीं

नगर निगम की जवाबदेही अपनी जगह है। लेकिन शहर के तीनों प्रमुख विधानसभा क्षेत्रों के जनप्रतिनिधियों की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने क्षेत्र की बुनियादी समस्याओं को विधानसभा, शासन और नगर निगम—हर स्तर पर उठाएं। पार्टी लाइन लोकतंत्र की मर्यादा हो सकती है, जनता की समस्या पर मौन रहने का कारण नहीं। अगर जनता जलभराव से परेशान है तो विधायक की आवाज विपक्षी नहीं हो जाती। अगर नाला बंद है तो उसे खोलने की मांग पार्टी विरोध नहीं होती। और अगर सड़क पर गंदा पानी बह रहा है तो उसके खिलाफ बोलना राजनीति नहीं—जनप्रतिनिधित्व है।


अब काशी सिर्फ पानी नहीं देख रही

काशी बहुत कुछ देख रही है। एक तरफ बड़े-बड़े विकास प्रोजेक्ट हैं। दूसरी तरफ पुरानी गलियां हैं।  एक तरफ चमकती सड़कें हैं। दूसरी तरफ बारिश में घुटनों तक पानी है। एक तरफ शहर को विश्वस्तरीय बनाने के दावे हैं। दूसरी तरफ नाले और सीवर की वही पुरानी समस्या। और अब नगर निगम कह रहा है—दो दिन में जलभराव खत्म करो। काशी पूछ रही है— दो दिन में पानी निकाल देंगे, पांच साल की बदहाली का हिसाब कब देंगे? क्योंकि चुनाव में वोट मांगने कोई जेई, एई या एक्सईएन नहीं आएगा। जनता के दरवाजे पर जनप्रतिनिधि ही जाएगा। तब काशी की गलियां शायद एक ही सवाल पूछेंगी— “साहब, याद है? पिछली बारिश में पानी हमारे घर में आया था।”




Suresh-gandhi


सुरेश गांधी

वरिष्ठ पत्रकार 

वाराणसी

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