आलेख : कुपोषण से लड़ाई में क्यों न जेन-जी को जोड़ा जाए? - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

आलेख : कुपोषण से लड़ाई में क्यों न जेन-जी को जोड़ा जाए?

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आज की जेन जी पीढ़ी यानी कॉलेज और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले युवा तकनीक, डिजिटल माध्यमों और नए विचारों के साथ आगे बढ़ रहे हैं। उनके पास सीखने, प्रयोग करने और अपनी बात को नए तरीकों से रखने की क्षमता है। लेकिन क्या इस पीढ़ी की ऊर्जा और रचनात्मकता का इस्तेमाल गांव के उन छोटे बच्चों के विकास के लिए भी किया जा सकता है, जिन्हें जीवन की शुरुआती उम्र में बेहतर पोषण, शिक्षा और सीखने के अवसरों की जरूरत है? यदि कॉलेज और विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को आंगनबाड़ी केंद्रों से जोड़ा जाए, तो यह बच्चों के शुरुआती विकास को बेहतर बनाने की दिशा में एक उपयोगी पहल हो सकती है। इससे एक ओर बच्चों को सीखने के नए अवसर मिलेंगे, वहीं दूसरी ओर युवाओं को अपनी शिक्षा और ज्ञान का इस्तेमाल सामाजिक बदलाव के लिए करने का अवसर मिलेगा।


भारत में आंगनबाड़ी केंद्रों की भूमिका केवल बच्चों को पोषाहार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। इन केंद्रों के माध्यम से छह वर्ष तक के बच्चों को पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं और शुरुआती शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। जीवन के शुरुआती छह वर्ष बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान उन्हें पर्याप्त पोषण के साथ ऐसा वातावरण मिलना जरूरी है, जहां वे खेलते हुए सीख सकें, सवाल पूछ सकें और अपनी कल्पना शक्ति का इस्तेमाल कर सकें। लेकिन देश के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं पर कई तरह की जिम्मेदारियां होती हैं। ऐसे में बच्चों के साथ अलग-अलग गतिविधियां करने और उन्हें व्यक्तिगत रूप से समय देने के लिए पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाता। यहां कॉलेज और विश्वविद्यालयों के युवाओं की भागीदारी एक उपयोगी पहल बन सकती है। जेन जी के युवा डिजिटल तकनीक, सोशल मीडिया, नए संचार माध्यमों और रचनात्मक गतिविधियों से परिचित हैं। वे अपनी इस समझ को गांव के छोटे बच्चों के सीखने के अनुभव को बेहतर बनाने में इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को अपने आसपास के गांवों के आंगनबाड़ी केंद्रों के साथ जोड़ा जा सकता है।


इसके लिए प्रत्येक शिक्षण संस्थानों को अपने आसपास के आंगनबाड़ी केंद्रों के साथ नियमित सहयोग की व्यवस्था विकसित करनी होगी। राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयंसेवकों को इस काम से जोड़ा जा सकता है। इसके अतिरिक्त शिक्षा, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, सामाजिक कार्य, पोषण और कंप्यूटर जैसे विषयों की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों को भी इसमें शामिल किया जा सकता है। इससे अलग-अलग विषयों का ज्ञान रखने वाले युवाओं को बच्चों के विकास में योगदान देने का अवसर मिलेगा। इस दिशा में हर कॉलेज और विश्वविद्यालय एक 'आंगनबाड़ी साथी कार्यक्रम' शुरू कर सकता है। इसके तहत विद्यार्थियों के छोटे समूह बनाए जाएं और उन्हें नजदीकी आंगनबाड़ी केंद्रों के साथ जोड़ा जाए। जहां ये विद्यार्थी सप्ताह में एक या दो दिन निर्धारित समय पर केंद्र पहुंचकर बच्चों के साथ कहानी सुनाने, चित्र बनाने, कविता, पहेली, खेल और समूह गतिविधियों में हिस्सा लें। उदाहरण के लिए, हिंदी और साहित्य के विद्यार्थी बच्चों को चित्रों के माध्यम से कहानियां सुना सकते हैं, कला के विद्यार्थी रंगों और चित्रकारी के जरिए उन्हें नई चीजें सिखा सकते हैं और वहीं विज्ञान के विद्यार्थी पानी, पौधों, जानवरों तथा प्रकृति से जुड़े सरल प्रयोगों के माध्यम से उनकी जिज्ञासा बढ़ा सकते हैं। इस तरह बच्चों को किताबों से अलग सीखने का अनुभव मिलेगा।


इस पहल को केवल बच्चों की गतिविधियों तक सीमित रखने की भी जरूरत नहीं है। पोषण और स्वास्थ्य के क्षेत्र में पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर स्थानीय खाद्य पदार्थों और संतुलित आहार से संबंधित सरल जानकारी तैयार कर सकते हैं। वे स्थानीय अनाज, दालों, हरी सब्जियों और मौसमी फलों से बनने वाले पौष्टिक व्यंजनों की जानकारी चित्रों और सरल भाषा में अभिभावकों तक पहुंचाने में सहयोग कर सकते हैं। वहीं कंप्यूटर और मीडिया की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी आंगनबाड़ी केंद्रों के लिए डिजिटल शिक्षण सामग्री और ऑडियो कहानियां तैयार कर सकते हैं। हालांकि, स्वास्थ्य जांच, पोषण की चिकित्सकीय सलाह और सरकारी सेवाओं का संचालन संबंधित विभागों की जिम्मेदारी ही रहना चाहिए। इससे बच्चों और युवाओं दोनों को लाभ मिलने की उम्मीद है। छोटे बच्चों को नियमित रूप से नए लोगों के साथ संवाद करने, अपनी बात रखने, समूह में काम करने और नई गतिविधियां सीखने का अवसर मिलेगा। जिन बच्चों को घर पर किताबें, खिलौने या सीखने के पर्याप्त संसाधन नहीं मिल पाते, उन्हें आंगनबाड़ी में इनका अनुभव मिल सकेगा। वहीं विद्यार्थियों को ग्रामीण जीवन, बच्चों की जरूरतों, पोषण और शिक्षा से जुड़ी वास्तविक परिस्थितियों को समझने का अवसर मिलेगा। वे अपनी कक्षा में सीखे गए ज्ञान को व्यवहार में इस्तेमाल कर सकेंगे। इससे उनमें संवेदनशीलता, नेतृत्व क्षमता और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना भी विकसित हो सकती है।


हालांकि, इस पहल को सफल बनाने के लिए कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं। युवाओं की भागीदारी केवल किसी विशेष दिवस या कॉलेज के वार्षिक शिविर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसके लिए प्रत्येक शिक्षण संस्थान को एक निश्चित समय-सारणी बनानी होगी। विद्यार्थियों के साथ एक शिक्षक या संकाय सदस्य को मार्गदर्शक के रूप में जोड़ा जाना चाहिए। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की सहमति और देखरेख में ही बच्चों के साथ गतिविधियां आयोजित हों। बच्चों की सुरक्षा, अभिभावकों की सहमति और उनकी निजी जानकारी की गोपनीयता का भी ध्यान रखा जाए। आंगनबाड़ी केंद्रों को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी केवल सरकार और वहां काम करने वाले कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसके लिए शिक्षण संस्थानों और युवा पीढ़ी की भागीदारी भी महत्वपूर्ण हो सकती है। जिस तरह कॉलेजों में पढ़ने वाले युवाओं को विभिन्न सामाजिक गतिविधियों से जोड़ा जाता है, उसी तरह उन्हें छोटे बच्चों के शुरुआती विकास से जोड़ने की जरूरत है। यदि जेन जी की ऊर्जा, रचनात्मकता और ज्ञान को आंगनबाड़ी केंद्रों से जोड़ा जाए, तो गांव के बचपन को बेहतर बनाने की दिशा में एक नई शुरुआत हो सकती है।






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कविता नायक

लूणकरणसर, राजस्थान

टीम, गाँव की आवाज़

(यह लेखिका के निजी विचार हैं।)

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