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गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

विशेष आलेख : काशी में विकास जीता, भाजपा क्यों हारी? लखनऊ में भी झटका

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र काशी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लगातार सक्रियता और विकास परियोजनाओं की चमक—फिर भी विधान परिषद की दोनों सीटों पर भाजपा को शिकस्त! यह महज चुनावी हार नहीं, संगठन के लिए आत्ममंथन का अवसर है। सवाल है कि जब सरकार विकास के लिए खजाना खोल रही है, तब उसका राजनीतिक लाभ जमीन पर क्यों नहीं दिखा? क्या कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, जनप्रतिनिधियों की दूरी, गुटबाजी और संभावित भीतरघात ने भाजपा की राह कठिन की? इन आशंकाओं की तथ्यपरक जांच जरूरी है। प्रधानमंत्री का अपनापन और मुख्यमंत्री की सक्रियता तभी वोटों में बदलती है, जब स्थानीय कार्यकर्ता सम्मानित हो और जनता की आवाज सुनी जाए। काशी के बाद लखनऊ में भी सपा की सफलता ने विपक्ष को मनोवैज्ञानिक बढ़त का अवसर दिया है। हालांकि, शिक्षक-स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के नतीजे विधानसभा चुनाव का सीधा संकेत नहीं हैं, लेकिन इन्हें अनदेखा करना भूल होगी। कांग्रेस चार राज्यों की 28 एमएलसी सीटों पर खाता नहीं खोल सकी, जबकि बसपा का सीमित प्रभाव उसके संगठन पर सवाल उठाता है। तीनों दलों के सामने अलग-अलग चुनौतियां हैं। 2027 से पहले काशी का संदेश साफ है—विकास जरूरी है, लेकिन संगठन की मजबूती, कार्यकर्ता का सम्मान और जनता से संवाद के बिना सियासी दुर्ग सुरक्षित नहीं रहता


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वाराणसी में विकास की गंगा बह रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र होने के कारण काशी केंद्र और प्रदेश सरकार की प्राथमिकताओं में है। प्रधानमंत्री जब भी यहां आते हैं, अपनेपन का संदेश देते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी नियमित रूप से काशी पहुंचकर विकास कार्यों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की समीक्षा करते हैं। काशी विश्वनाथ धाम से लेकर सड़क, यातायात, पर्यटन और आधारभूत सुविधाओं तक, सरकार की उपलब्धियां गिनाने के लिए भाजपा के पास बहुत कुछ है। फिर भी विधान परिषद चुनाव में काशी की दोनों सीटों पर समाजवादी पार्टी की जीत ने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है—जब शीर्ष नेतृत्व काशी के विकास के लिए इतना समर्पित है, तो स्थानीय राजनीतिक जमीन पर भाजपा से कहां चूक हो रही है? यह सवाल केवल दो सीटों का नहीं, बल्कि सरकार की उपलब्धियों को मतदाता के भरोसे में बदलने की संगठनात्मक क्षमता का है। वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में सपा के लाल बिहारी यादव ने भाजपा के प्रमोद कुमार मिश्रा को 4,898 मतों से हराया। स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में सपा के आशुतोष सिन्हा ने भाजपा के केदारनाथ सिंह को पराजित किया। चुनावी मतगणना के दौरान नौवें चक्र तक उपलब्ध प्रथम वरीयता के आंकड़ों में आशुतोष सिन्हा 16,984 मतों से आगे थे। अंतिम नतीजे में उनकी जीत दर्ज हुई। इस तरह प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में भाजपा को दोनों सीटों पर झटका लगा। काशी के नतीजों की अहमियत इसलिए भी है कि यहां प्रधानमंत्री का व्यक्तिगत जुड़ाव, मुख्यमंत्री की सक्रियता और विकास परियोजनाओं का राजनीतिक संदेश—तीनों मौजूद हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या स्थानीय संगठन इन उपलब्धियों को जमीनी समर्थन में बदलने में कमजोर पड़ रहा है?


वोटर बढ़े, भाजपा की पकड़ क्यों नहीं बढ़ी?

काशी की स्नातक एमएलसी सीट पर 2020 और 2026 के नतीजों की तुलना भाजपा के लिए कई सवाल छोड़ती है। छह साल में मतदाताओं की संख्या बढ़ी, मतदान भी बढ़ा, लेकिन भाजपा इस सीट पर अपना कब्जा नहीं जमा सकी। सपा के आशुतोष सिन्हा ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। यह नतीजा बताता है कि स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में केवल राजनीतिक प्रभाव या विकास के दावे पर्याप्त नहीं हैं। मतदाता सूची तैयार कराने से लेकर समर्थकों को बूथ तक पहुंचाने और मतगणना की रणनीति तक हर स्तर पर संगठन की भूमिका महत्वपूर्ण है।


छह साल में 78 हजार से अधिक मतदाता बढ़े

2020 के वाराणसी खंड स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में कुल 2,09,754 मतदाता पंजीकृत थे। इनमें से 82,498 ने मतदान किया था। मतदान प्रतिशत 39.33 रहा। उस चुनाव में सपा के आशुतोष सिन्हा को 26,335 और भाजपा के केदारनाथ सिंह को 22,685 वोट मिले थे। सपा की जीत का अंतर 3,650 मतों का था। 2026 में इसी निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं की संख्या बढ़कर 2,88,553 हो गई। यानी छह साल में 78,799 मतदाता बढ़े—करीब 37.6 प्रतिशत की वृद्धि। इस बार 1,18,611 मतदाताओं ने वोट डाला और मतदान प्रतिशत 41.11 रहा। वोट डालने वालों की संख्या में 36,113 की वृद्धि हुई, जबकि मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी केवल 1.78 प्रतिशत अंक रही।


असली सवाल: नाम जुड़े, लेकिन किसके समर्थक सक्रिय हुए?

इन आंकड़ों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मतदाता सूची का विस्तार अपने आप किसी दल के पक्ष में वोट नहीं बन जाता। पंजीकरण के बाद मतदाताओं से संपर्क, मतदान की तारीख की जानकारी, मतदान केंद्र तक पहुंचने की व्यवस्था और चुनाव के दिन सक्रियता भी मायने रखती है। 2026 में कुल पंजीकृत मतदाताओं में से 1,69,942 ने मतदान नहीं किया। यानी लगभग 58.9 प्रतिशत मतदाता वोट डालने नहीं पहुंचे। यह आंकड़ा सभी दलों के लिए मतदाता सक्रियता की चुनौती दिखाता है। हालांकि, केवल इससे यह साबित नहीं होता कि अनुपस्थित मतदाता किसी एक दल के समर्थक थे या भाजपा को पंजीकरण के मोर्चे पर ही नुकसान हुआ। 2020 में आशुतोष सिन्हा ने भाजपा के केदारनाथ सिंह को 3,650 मतों से हराया था। 2026 की मतगणना के चौथे दौर में सिन्हा को 22,599 और केदार सिंह को 15,404 मत मिले थे। उस समय सपा प्रत्याशी की बढ़त 7,195 मतों की थी। बाद में सिन्हा की जीत हुई। लेकिन चौथे दौर के आंकड़ों को 2020 के अंतिम परिणाम से सीधे तुलना करके अंतिम जीत का अंतर नहीं माना जा सकता। दोनों चुनावों के अंतिम, समान आधार वाले आंकड़े सामने रखकर ही यह तय किया जा सकता है कि किस दल का मताधार कितना बढ़ा या घटा।


2027 से पहले संगठन के लिए सबक

प्रदेश की 11 एमएलसी सीटों पर भाजपा ने छह और सपा ने पांच सीटें जीतीं। 2020 में भाजपा के पास छह सीटें थीं, जबकि सपा के पास तीन थीं और दो सीटें निर्दलीय सदस्यों के पास थीं। इस बार भाजपा की कुल सीटें छह ही रहीं, जबकि सपा ने अपना आंकड़ा बढ़ाकर पांच कर लिया। इस परिणाम को विधानसभा चुनाव का सीधा पूर्वानुमान मानना सही नहीं होगा, क्योंकि स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों का मतदाता वर्ग आम विधानसभा चुनाव से अलग है। फिर भी भाजपा के लिए सवाल स्पष्ट है—क्या संगठन का विस्तार पंजीकृत मतदाताओं को मतदान में बदलने तक पहुंच रहा है? और क्या प्रत्याशी चयन, स्थानीय संपर्क तथा कार्यकर्ताओं की सक्रियता में कहीं ऐसी कमियां रहीं, जिनका फायदा सपा को मिला? काशी का चुनावी संदेश यही है कि मतदाता सूची में नाम दर्ज कराना पहला कदम है, अंतिम लक्ष्य नहीं। पंजीकरण के बाद मतदाता को मतदान तक पहुंचाना और उसका भरोसा बनाए रखना ही संगठन की वास्तविक परीक्षा है.


काशी का सवाल: सरकार सक्रिय, फिर संगठन क्यों सुस्त?

भाजपा की चुनावी ताकत का बड़ा हिस्सा उसके बूथ प्रबंधन और कार्यकर्ता नेटवर्क से आता है। लेकिन कोई भी संगठन केवल शीर्ष नेतृत्व की लोकप्रियता के सहारे लगातार चुनाव नहीं जीत सकता। उसके लिए स्थानीय कार्यकर्ताओं का उत्साह, जनप्रतिनिधियों की उपलब्धता और मतदाताओं के साथ निरंतर संवाद जरूरी है। काशी में भाजपा को यह देखना होगा कि क्या कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं? क्या स्थानीय जनप्रतिनिधियों तक आम लोगों की पहुंच आसान है? क्या संगठन के पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल है? क्या जनता की छोटी-छोटी समस्याओं का समाधान समय पर हो रहा है? इन सवालों का जवाब केवल विकास परियोजनाओं की सूची से नहीं मिल सकता। बड़ी परियोजनाएं शहर की तस्वीर बदलती हैं, लेकिन मतदाता का रोजमर्रा का अनुभव भी राजनीतिक धारणा बनाता है। सड़क, यातायात, रोजगार, सरकारी कार्यालयों में कामकाज और जनप्रतिनिधियों की उपलब्धता जैसे मुद्दे स्थानीय स्तर पर असर डालते हैं। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की सक्रियता के बावजूद यदि कार्यकर्ता अपने को अनसुना महसूस करे, तो नेतृत्व की उपलब्धियों का संदेश कमजोर पड़ सकता है। यही वह विरोधाभास है जिसकी भाजपा को काशी में पड़ताल करनी चाहिए।


भीतरघात की आशंका : आरोप नहीं, तथ्य आधारित जांच हो

चुनाव के बाद गुटबाजी और भीतरघात की चर्चा अक्सर होती है। टिकट या संगठनात्मक जिम्मेदारियों को लेकर असंतोष, स्थानीय नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई और प्रचार में अपेक्षित सहयोग न मिलना किसी भी दल के चुनावी प्रयासों को प्रभावित कर सकता है। काशी में भी भाजपा को यह जांचना चाहिए कि चुनावी जिम्मेदारियां किस तरह निभाई गईं, कार्यकर्ताओं ने कितना सक्रिय सहयोग किया और किन क्षेत्रों में पार्टी का संपर्क कमजोर रहा। क्या किसी स्तर पर आपसी खींचतान ने अभियान को प्रभावित किया? क्या स्थानीय नेतृत्व ने चुनाव को उतनी गंभीरता से लिया जितनी अपेक्षित थी? लेकिन भीतरघात को हार का प्रमाणित कारण मान लेना उचित नहीं होगा, जब तक बूथवार आंकड़े, जिम्मेदारियों का रिकॉर्ड और विश्वसनीय साक्ष्य इसकी पुष्टि न करें। समीक्षा का उद्देश्य किसी गुट को बलि का बकरा बनाना नहीं, बल्कि वास्तविक कमियों को पहचानना होना चाहिए। यदि कार्यकर्ता नाराज थे तो क्यों? यदि प्रत्याशी के चयन में कमी थी तो क्या? यदि मतदाता तक पहुंच कमजोर थी तो जिम्मेदार कौन था? इन प्रश्नों से बचने के बजाय संगठन को खुलकर जवाब तलाशने होंगे।


लखनऊ में भी झटका, भाजपा के लिए व्यापक संदेश

काशी की तस्वीर को प्रदेश के दूसरे क्षेत्रों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। विधान परिषद चुनाव में लखनऊ स्नातक निर्वाचन क्षेत्र भी भाजपा के हाथ से निकल गया। सपा की कांति सिंह ने भाजपा के अवनीश कुमार सिंह को 17,225 मतों से हराया। दूसरी ओर, भाजपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ की स्नातक और शिक्षक सीटों सहित कई सीटों पर अपना प्रभाव बनाए रखा। उत्तर प्रदेश की 11 सीटों के अंतिम नतीजों में भाजपा को छह और सपा को पांच सीटें मिलीं। भाजपा ने 2020 में जीती छह सीटों का आंकड़ा बरकरार रखा, जबकि सपा ने अपनी पिछली तीन सीटों की संख्या बढ़ाकर पांच कर ली। इसलिए यह चुनाव भाजपा की प्रदेशव्यापी पराजय नहीं, बल्कि कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उसके सामने उभरी चुनौती और सपा के विस्तार का संकेत है। फिर भी काशी और लखनऊ जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में हार को सामान्य घटना मानकर टालना भाजपा के लिए जोखिम भरा हो सकता है। इन परिणामों से विपक्ष को यह कहने का अवसर मिला है कि भाजपा के मजबूत माने जाने वाले क्षेत्रों में भी मुकाबले की गुंजाइश है। सपा के लिए यह मनोवैज्ञानिक बढ़त है। पार्टी इन नतीजों को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने और भाजपा की चुनावी तैयारी पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल कर सकती है। हालांकि, विधान परिषद के स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाता विधानसभा चुनाव के मतदाताओं से अलग हैं। इसलिए इन परिणामों को विधानसभा चुनाव का सीधा पूर्वानुमान नहीं माना जा सकता। लेकिन संगठनात्मक मजबूती और स्थानीय असंतोष के संकेतों को समझने के लिए इन्हें नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।


कांग्रेस का सवाल: ईवीएम पर बहस, लेकिन संगठन कहां?

चार राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों के चुनाव में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी। यह उसके लिए आत्ममंथन का विषय है। उत्तर प्रदेश में मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा के बीच रहा, जबकि दूसरे राज्यों में भी कांग्रेस को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। कांग्रेस लंबे समय से चुनावी प्रक्रिया, ईवीएम और संस्थागत निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाती रही है। ऐसे में बैलेट पेपर से हुए इन चुनावों में सीट नहीं जीत पाना उसके राजनीतिक विमर्श को चुनौती देता है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि चुनावी अनियमितता की हर शिकायत गलत है। किसी भी आरोप का मूल्यांकन संबंधित चुनाव के साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए। कांग्रेस के सामने बड़ा सवाल यह है कि वह चुनावी बहस को केवल प्रक्रिया और सत्ता-विरोध तक सीमित रखेगी या अपना संगठन भी मजबूत करेगी? क्या उसके पास बूथ स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ता हैं? क्या स्थानीय नेतृत्व जनता के बीच नियमित रूप से मौजूद है? क्या प्रत्याशियों का चयन स्थानीय सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है? यदि पार्टी को लगातार चुनावों में अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही, तो केवल भाजपा की आलोचना पर्याप्त नहीं होगी। उसे अपने संगठन, नेतृत्व, जनसंपर्क और स्थानीय मुद्दों पर विश्वसनीय विकल्प पेश करने की क्षमता की समीक्षा करनी होगी।


बसपा की चुनौती : कभी मजबूत रहा आधार कहां कमजोर पड़ा?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा का अपना ऐतिहासिक आधार रहा है। दलित राजनीति, सामाजिक प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक अनुशासन उसकी पहचान के महत्वपूर्ण हिस्से रहे हैं। लेकिन हाल के वर्षों में राज्य की मुख्य राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में बसपा की भूमिका सीमित हुई है। विधान परिषद की इन सीटों पर बसपा की स्थिति भी यह सवाल उठाती है कि क्या पार्टी शिक्षक, स्नातक और अन्य प्रभावशाली मतदाता समूहों के बीच अपना संवाद बनाए रख पा रही है। हालांकि, इन चुनावों के परिणामों से पूरे प्रदेश में बसपा के समर्थन का सटीक आकलन नहीं किया जा सकता। इन निर्वाचन क्षेत्रों का मतदाता वर्ग सीमित और विशिष्ट है। बसपा के सामने चुनौती है कि वह अपने पारंपरिक सामाजिक आधार से आगे बढ़कर युवाओं, शिक्षित वर्गों और स्थानीय मुद्दों से जुड़े मतदाताओं तक अपनी पहुंच कैसे बढ़ाए। क्या पार्टी का संगठन सक्रिय है? क्या उसके स्थानीय पदाधिकारी नियमित जनसंपर्क करते हैं? क्या जनता को उसकी राजनीतिक भूमिका और कार्यक्रमों के बारे में स्पष्ट संदेश मिल रहा है? यदि संगठन जमीनी स्तर पर निष्क्रिय दिखाई देता है, तो केवल पुराने समर्थन आधार के भरोसे राजनीतिक प्रभाव बनाए रखना कठिन हो सकता है। बसपा को भी अपनी रणनीति और संगठनात्मक उपस्थिति की समीक्षा करनी होगी।


2027 से पहले भाजपा के लिए पांच जरूरी सबक

पहला—कार्यकर्ताओं की उपेक्षा बंद हो। पार्टी को बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की शिकायतें सुनने और उनके समाधान की व्यवस्था बनानी चाहिए। चुनाव के समय सक्रियता दिखाने के बजाय नियमित संवाद जरूरी है। दूसरा—जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय हो। जनता और कार्यकर्ताओं के लिए उपलब्धता, स्थानीय समस्याओं का समाधान और संगठन के साथ समन्वय समीक्षा का हिस्सा होना चाहिए। तीसरा—भीतरघात और गुटबाजी की तथ्यात्मक पड़ताल हो। आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि चुनावी आंकड़ों, जिम्मेदारियों और प्रमाणों के आधार पर कार्रवाई हो। चौथा—विकास का लाभ लोगों तक पहुंचे। परियोजनाओं के प्रचार के साथ यह भी देखा जाए कि स्थानीय नागरिकों को रोजगार, सुविधाओं और बेहतर प्रशासन का कितना लाभ मिल रहा है। पांचवां—काशी से पूरे प्रदेश तक संगठन की समीक्षा हो। जहां पार्टी जीती है, वहां भी संगठन की मजबूती और जहां हारी है, वहां हार के कारणों का निष्पक्ष आकलन किया जाए। जीत को केवल नेतृत्व की लोकप्रियता और हार को केवल प्रत्याशी की कमजोरी बताने से वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आएगी।


क्या राजनीतिक दल जनता के बीच हैं या केवल चुनाव के समय?

काशी में भाजपा की हार सरकार की सभी विकास उपलब्धियों को खारिज नहीं करती। उसी तरह, चार राज्यों में कांग्रेस का खाता नहीं खुलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि बैलेट पेपर पर चुनावी अनियमितता के आरोप निराधार हैं। बसपा की कमजोर चुनावी मौजूदगी का आकलन भी केवल इन नतीजों के आधार पर नहीं किया जा सकता। लेकिन इन परिणामों ने तीनों दलों के सामने अलग-अलग सवाल रखे हैं। भाजपा को अपनी संगठनात्मक कार्यशैली और स्थानीय नेतृत्व की समीक्षा करनी है। कांग्रेस को अपनी चुनावी विश्वसनीयता और जमीनी संगठन मजबूत करना है। बसपा को अपने सामाजिक आधार और राजनीतिक सक्रियता के बीच बढ़ती दूरी पर विचार करना है। काशी का संदेश भाजपा के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है: प्रधानमंत्री का अपनापन, मुख्यमंत्री की सक्रियता और विकास की उपलब्धियां तभी राजनीतिक ताकत बनेंगी, जब स्थानीय कार्यकर्ता और आम मतदाता खुद को उस विकास का सहभागी महसूस करेंगे। 2027 का विधानसभा चुनाव इन एमएलसी नतीजों से तय नहीं होता। लेकिन उससे पहले काशी और लखनऊ जैसे क्षेत्रों से मिले संकेतों को गंभीरता से लेना सभी दलों के लिए जरूरी है। भाजपा के लिए यह संगठन सुधारने का अवसर है, सपा के लिए अपना जनाधार बढ़ाने की चुनौती, कांग्रेस के लिए जमीनी पुनर्निर्माण का सवाल और बसपा के लिए राजनीतिक प्रासंगिकता मजबूत करने की परीक्षा। आखिरकार, लोकतंत्र में विकास का दावा, नेतृत्व की लोकप्रियता और पुराना जनाधार—इनमें से कोई भी जनता से निरंतर संवाद का विकल्प नहीं हो सकता।







Suresh-gandhi


सुरेश गांधी

वरिष्ठ पत्रकार 

वाराणसी

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