विशेष आलेख : शौचालय की सुविधा ने दिलाई अंधेरे के इंतजार से मुक्ति - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

विशेष आलेख : शौचालय की सुविधा ने दिलाई अंधेरे के इंतजार से मुक्ति

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किसी घर में शौचालय होना एक ऐसी सुविधा है, जिसकी अहमियत अक्सर तब समझ में आती है, जब वह उपलब्ध न हो। सुबह होने से पहले शौच के लिए बाहर निकलना, दिन में जरूरत पड़ने पर शाम तक इंतजार करना या रात के अंधेरे में घर से दूर जाना, ग्रामीण भारत में लंबे समय तक अनेक महिलाओं और किशोरियों की दिनचर्या का हिस्सा रहा है। यह केवल असुविधा का सवाल नहीं था। इसके साथ सुरक्षा, निजता और स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएं भी जुड़ी थीं। जिन जरूरतों को पूरा करने के लिए पुरुषों को दिनचर्या में बहुत बदलाव नहीं करना पड़ता, उन्हीं के लिए महिलाओं को अपने समय और परिस्थितियों के साथ समझौता करना पड़ता था। ऐसे में घर के भीतर शौचालय का निर्माण ग्रामीण परिवारों के जीवन में एक महत्वपूर्ण बदलाव लेकर आया है। स्वच्छता की इस सुविधा ने महिलाओं और किशोरियों को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए दूसरों की सुविधा या अंधेरे पर निर्भर रहने से काफी हद तक मुक्ति दिलाई है। राजस्थान के बीकानेर जिले के लूणकरणसर ब्लॉक का खियेरा गांव इस बदलाव का एक उदाहरण है। यहां लगभग सभी घरों में सरकारी सहायता से शौचालय बन चुके हैं।


गांव की 40 वर्षीय पार्वती बताती हैं कि उन्होंने भी सरकार की मदद से अपने घर में शौचालय बनवाया है। वह कहती हैं, “अब रात में या सुबह उजाला होने से पहले शौच के लिए बाहर जाने की परेशानी नहीं उठानी पड़ती।” वहीं उसकी 12 वर्षीय बेटी सतना के लिए घर के साथ-साथ स्कूल में शौचालय होना भी महत्वपूर्ण है। वह खुशी से बताती है कि उसके स्कूल में लड़कियों के लिए अलग शौचालय बना हुआ है और वह साफ रहता है। किशोरावस्था में पहुंच रही लड़कियों के लिए स्कूल में ऐसी सुविधा का होना उनकी पढ़ाई और नियमित उपस्थिति से जुड़ा है। यदि स्कूल में शौचालय न हो या वह गंदा हो, तो लड़कियों को अपनी जरूरतों को टालना पड़ सकता है। कई बार यह परेशानी उनकी पढ़ाई के बीच बाधा बनती है। इसलिए स्कूल में शौचालय का निर्माण तभी सार्थक है, जब उसमें पानी, साबुन, साफ-सफाई और पर्याप्त निजता की व्यवस्था भी हो। इसी गांव में छह माह पहले शादी करके आई 21 वर्षीय प्रीति बताती हैं कि जब उसने ससुराल में घर के अंदर शौचालय देखा, तो उन्हें बहुत खुशी हुई। उसने यह बात अपने माता-पिता को भी बताई। अब उनके मायके में भी शौचालय निर्माण के लिए आवेदन दिया गया है।


दरअसल गाँव में स्वच्छता की तस्वीर बदलने में स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसकी शुरुआत 2 अक्टूबर 2014 को हुई थी। जल शक्ति मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी 2026 तक देश में इस मिशन के तहत 12,04,87,602 व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों का निर्माण दर्ज किया गया। राजस्थान में यह संख्या 85,90,938 थी। ये आंकड़े ग्रामीण परिवारों तक शौचालय की सुविधा पहुंचाने के व्यापक प्रयास को दर्शाते हैं। हालांकि, निर्मित शौचालयों की कुल संख्या और वर्तमान में शौचालय से वंचित परिवारों की संख्या अलग-अलग बातें हैं। निर्माण के बाद शौचालय का चालू रहना, पानी उपलब्ध होना और उसका नियमित इस्तेमाल भी जरूरी है। हालांकि कुछ ग्रामीण परिवार अब भी शौचालय की सुविधा से वंचित हैं। इसके पीछे आर्थिक तंगी, घर में पर्याप्त जगह का अभाव, पानी की कमी, निर्माण की तकनीकी जानकारी न होना या सरकारी सहायता के लिए आवेदन करने में कठिनाई जैसी वजहें हो सकती हैं। कुछ परिवार शुरुआती खर्च वहन नहीं कर पाते, तो कुछ को पात्रता की पुष्टि या सहायता राशि मिलने में परेशानी होती है। भूमिहीन परिवारों और अस्थायी आवास में रहने वाले लोगों की जरूरतें भी अलग होती हैं।


इस स्थिति में ग्राम पंचायतों को शौचालय निर्माण की सूची से आगे बढ़कर प्रत्येक परिवार की वास्तविक जरूरतों का आकलन करना चाहिए। जिन परिवारों के पास जगह कम है या निर्माण की शुरुआती लागत जुटाना कठिन है, उनके लिए उपयुक्त तकनीकी विकल्प और सरकारी सहायता तक पहुंच आसान बनाई जानी चाहिए। महिलाओं और किशोरियों से अलग से बातचीत करके यह भी समझना जरूरी है कि मौजूदा शौचालय उनकी जरूरतें पूरी कर रहे हैं या नहीं। इससे योजना का आकलन केवल सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर नहीं, बल्कि लोगों के वास्तविक अनुभवों के आधार पर भी हो सकेगा। ग्रामीण भारत में शौचालय निर्माण की उपलब्धि को समझने के लिए खियेरा गांव की पार्वती, सतना और प्रीति के अनुभव महत्वपूर्ण हैं। पार्वती के लिए इसका अर्थ है सुबह और रात की परेशानी से राहत, सतना के लिए स्कूल में अपनी जरूरतों को सम्मान के साथ पूरा करने की सुविधा और प्रीति के लिए अपने मायके में भी बदलाव की प्रेरणा। ये अनुभव बताते हैं कि स्वच्छता की किसी योजना का वास्तविक महत्व आंकड़ों के साथ-साथ लोगों के जीवन में आए बदलाव से भी मापा जाना चाहिए। दरअसल, लक्ष्य केवल हर घर में शौचालय बनाना नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि किसी महिला या किशोरी को अपनी बुनियादी जरूरत पूरी करने के लिए अंधेरे का इंतजार न करना पड़े। जब गांव की हर महिला और किशोरी इस सुविधा का लाभ उठाएगी, तभी स्वच्छता का अर्थ पूरा होगा और योजना की वास्तविक उपलब्धि कही जाएगी।







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माया
लूणकरणसर, राजस्थान
टीम, गाँव की आवाज़
(यह लेखिका की निजी राय है)

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