धारा सात के तहत, अगर कोई स्वेच्छा से अपना व्यक्तिगत डेटा देता है या उसके इस्तेमाल पर उसने आपत्ति नहीं जताई है तो डेटा फिड्यूशियरी उस डेटा का इस्तेमाल कर सकती है। इस कानून का उल्लंघन करने पर 250 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। इलेक्ट्रॉनिक एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईआईटीवाई) ने 13 नवंबर 2025 को इससे जुड़े नियमों को अधिसूचित किया था। इन्हें 18 महीने की अवधि में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना है। प्रकाशकों के अनुसार इससे पत्रकारिता को नुकसान क्यों होगा? कानून को दी गई चुनौती का मुख्य आधार यह है कि इसमें समाचार रिपोर्टिंग को कोई विशेष छूट नहीं दी गई है। डीपीडीपी अधिनियम की धारा सात में बताए गए वैध उद्देश्यों और धारा 17 में दी गई छूटों में भी समाचार रिपोर्टिंग का उल्लेख नहीं है। धारा 17 में उन स्थितियों के बारे में बताया गया है, जिनमें व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा से जुड़े नियम लागू नहीं होते। इनमें वे मामले भी शामिल हैं, जब किसी कानूनी अधिकार या दावे को लागू करने के लिए किसी व्यक्ति के निजी डेटा का इस्तेमाल किया जाता है।
इसमें न्यायिक और नियामक कार्य भी शामिल हैं। इसके तहत अदालतें, न्यायाधिकरण या कानून के तहत अधिकृत संस्थाएं अपने न्यायिक, अर्ध-न्यायिक, नियामक या निगरानी संबंधी कामकाज के लिए जरूरी व्यक्तिगत डेटा का इस्तेमाल कर सकती हैं। इस कानून के 2018, 2019 और 2021 के शुरुआती मसौदों में पत्रकारिता को ऐसी छूट दी गई थी। प्रकाशकों के मुताबिक, इसका मतलब है कि किसी व्यक्ति के बारे में खबर लिखने वाले पत्रकार को पहले उस व्यक्ति की सहमति लेनी पड़ सकती है। नियमों में क्या प्रावधान हैं? इन नियमों में बताया गया है कि सहमति लेने, सूचना देने और डेटा में सेंध लगने की जानकारी देने की प्रक्रिया किस तरह काम करेगी। इनमें सबसे अधिक विवादित नियम 23 है, जिसे अधिनियम की धारा 36 के तहत बनाया गया है। यह केंद्र सरकार को अपने अधिकृत व्यक्ति के माध्यम से किसी भी डेटा फिड्यूशियरी या मध्यस्थ से जानकारी मांगने का अधिकार देता है। साथ ही, सरकार डेटा फिड्यूशियरी या मध्यस्थ को यह बताने से भी रोक सकती है कि उनसे ऐसी जानकारी मांगी गई है। सूचना के अधिकार का मुद्दा क्या है? याचिका में डीपीडीपी अधिनियम की धारा 44(3) को भी चुनौती दी गई है। इस प्रावधान के तहत सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम की धारा 8(1)(जे) में बदलाव किया गया था। पहले व्यक्तिगत जानकारी को तभी रोका जा सकता था, जब उसका किसी सार्वजनिक गतिविधि से संबंध नहीं होता था या उसे जारी करने से किसी व्यक्ति की निजता का अनुचित हनन होता था। हालांकि, व्यापक जनहित में ऐसी जानकारी जारी की जा सकती थी। संशोधित प्रावधान में अब केवल ‘‘व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित सूचना’’ को छूट दी गई है।

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