इससे पहले, पांच अक्टूबर को उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि वह निर्वाचन आयोग के सभी फैसलों की जांच करेगा और कानून के अनुरूप नहीं पाए जाने वाले फैसलों को रद्द कर देगा। न्यायालय ने इस मामले में केंद्र और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किए थे। ये याचिकाएं ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की 25 सितंबर की एक खबर के बाद दायर की गई थीं। खबर में कहा गया था कि निर्वाचन आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े फैसलों और आदेशों पर लिखित रूप में आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि ये फैसले और आदेश उनकी जानकारी या सिफारिश के बिना जारी किए गए थे। इस दावे के बाद विपक्षी दलों और कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) ने विरोध प्रदर्शन किए और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग की। अपने जवाबी हलफनामे में, चुनाव आयोग ने कहा कि एसआईआर प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मिले संवैधानिक दायित्व के निर्वहन में की गई थी। इसके साथ ही इसमें 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' और लागू नियमों को भी ध्यान में रखा गया था। फॉर्म छह में एसआईआर संबंधी आदेशों के जरिए संशोधन किए जाने के दावे को खारिज करते हुए आयोग ने कहा कि इस प्रक्रिया के लिए निर्धारित घोषणा-पत्र एक अलग दस्तावेज है और मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए इस्तेमाल होने वाले वैधानिक फॉर्म का हिस्सा नहीं है। आयोग ने कहा कि घोषणा-पत्र का उद्देश्य आवेदकों की पात्रता की पुष्टि करना और उनके विवरण को पिछले विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान तैयार की गई मतदाता सूचियों से जोड़ने में सुविधा प्रदान करना था।
आयोग ने कहा कि एसआईआर के बाद के चरणों के लिए लागू किए गए घोषणा-पत्र के प्रारूप में पहले के प्रारूप की तुलना में बदलाव किया गया था। इसका उद्देश्य आवेदकों के लिए प्रक्रिया को आसान बनाना था, ताकि वे पिछली मतदाता सूचियों में दर्ज अपने या अपने रिश्तेदारों के विवरण दे सकें। हलफनामे के अनुसार, जिन आवेदकों के विवरण पिछली मतदाता सूचियों से जोड़े जा सकते थे, वे अतिरिक्त दस्तावेजों के बिना फॉर्म छह के साथ घोषणा-पत्र जमा कर सकते थे। जिन आवेदकों के पास ऐसे विवरण उपलब्ध नहीं थे या जिनके रिकॉर्ड पिछली सूचियों से नहीं जोड़े जा सके, उन्हें निर्धारित नियमों के अनुसार सहायक दस्तावेज जमा करने होते। आयोग ने 27 मई, 2026 को ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत निर्वाचन आयोग’ मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले का भी हवाला दिया। आयोग के अनुसार, इस फैसले में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण के लिए दस्तावेजों का ढांचा निर्धारित करने के उसके अधिकार को मान्यता दी गई थी। हलफनामे में यह भी कहा गया कि आयोग ने उन मतदाताओं के लिए प्रक्रिया आसान बनाने का फैसला किया था, जिनके नाम का पिछली मतदाता सूचियों से मिलान नहीं हो सका था या जिनके रिकॉर्ड में विसंगतियां थीं। इसके तहत बूथ स्तर के अधिकारी (बीएलओ) ऐसे मतदाताओं के घर जाकर दस्तावेज एकत्र करेंगे। इन दस्तावेजों को विचार के लिए निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों के पास भेजा जाएगा। निर्वाचन आयोग ने कहा कि एसआईआर की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी पात्र व्यक्तियों को मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन करने से नहीं रोका गया है। उसने कहा कि संबंधित नियमों के तहत मतदाता सूचियों को नियमित रूप से अद्यतन करने की प्रक्रिया जारी रहेगी। आयोग ने अदालत से याचिकाकर्ता के दावों को खारिज करने का आग्रह करते हुए उन्हें निराधार बताया।

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