प्रत्येक कुएं के लिए सहायता की अधिकतम सीमा 675 करोड़ रुपये तय की गई है। वहीं, चट्टानों की परतों और भूगर्भीय संरचना का अध्ययन करने वाले चार ‘स्ट्रैटिग्राफिक’ कुओं के लिए लागत का 100 प्रतिशत तक सहयोग दिया जाएगा। प्रत्येक ऐसे कुएं के लिए अधिकतम 1,350 करोड़ रुपये की सीमा निर्धारित की गई है। इस सहायता के लिए केवल सरकारी कंपनियां या उनके नेतृत्व वाले गठबंधन आवेदन कर सकेंगे। भुगतान खुदाई की प्रगति के आधार पर किया जाएगा। स्वीकृत गहराई का 40 प्रतिशत पूरा होने पर 40 प्रतिशत राशि और कुएं की खुदाई पूरी होने तथा रिपोर्ट मंजूर होने पर शेष 60 प्रतिशत राशि दी जाएगी। निर्धारित अधिकतम सीमाओं के आधार पर केवल कुओं की खुदाई के लिए सरकारी सहायता 43,200 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। हालांकि, दिशानिर्देशों में योजना के कुल बजट का अलग-अलग मद में विस्तृत ब्योरा नहीं दिया गया है। योजना का लाभ केवल उन ब्लॉक या क्षेत्रों को मिलेगा, जिन्हें 2016 से शुरू हुई बोली प्रक्रिया के तहत राजस्व हिस्सेदारी अनुबंध व्यवस्था में आवंटित किया गया है। इससे पहले उत्पादन हिस्सेदारी अनुबंध व्यवस्था के तहत आवंटित ब्लॉक और कोल-बेड मीथेन परियोजनाएं इसके दायरे से बाहर रहेंगी, जब तक कि सरकार इसके लिए कोई अधिसूचना जारी नहीं करती।
इसके अलावा, सहायता केवल नए संसाधनों की खोज के लिए खोदे जाने वाले कुओं पर लागू होगी। पहले से खोजे जा चुके तेल या गैस भंडार से उत्पादन शुरू करने के लिए बनाए जाने वाले विकास कुओं और ‘साइडट्रैक’ कुओं की लागत पर अनुदान नहीं मिलेगा। योजना वित्त वर्ष 2030-31 तक लागू रहेगी। वित्त वर्ष 2026-27 को तैयारी वर्ष रखा गया है, जबकि वित्त वर्ष 2027-28 से 2030-31 तक पहला चरण संचालित होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2025 को स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में इस योजना की घोषणा की थी। उन्होंने समुद्र के नीचे तेल और गैस के भंडार खोजने के लिए मिशन मोड में काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया था। पेट्रोलियम सचिव नीरज मित्तल ने दिशानिर्देशों की प्रस्तावना में इसे हाल के वर्षों में तेल एवं गैस क्षेत्र में सबसे महत्वाकांक्षी सरकारी पहल में से एक बताया। उनके अनुसार, इस योजना से देश के भंडार में 60 करोड़ टन से अधिक तेल समतुल्य संसाधन जुड़ने की संभावना है। समुद्र मंथन योजना के दूसरे हिस्से में ऐसे तेल एवं गैस भंडार के विकास के लिए व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (वीजीएफ) का प्रावधान है, जो अकेले व्यावसायिक रूप से लाभदायक नहीं हैं। इसके तहत दो या अधिक छोटे अथवा अविकसित तेल-गैस क्षेत्रों को एक साझा उत्पादन प्रणाली से जोड़ने के लिए समुद्र के भीतर मैनिफोल्ड, मुख्य पाइपलाइन, केंद्रीय प्रसंस्करण मंच और साझा फ्लोटिंग उत्पादन इकाइयों जैसी सुविधाओं के निर्माण में मदद दी जाएगी।
शुरुआती स्तर पर इस सहायता के लिए महानदी बेसिन को प्राथमिकता दी गई है, जबकि कच्छ बेसिन के लिए सांकेतिक राशि का प्रावधान है। ऐसे बुनियादी ढांचे के निर्माण और संचालन के लिए संबंधित कंपनियां संयुक्त उद्यम या विशेष इकाई गठित कर सकेंगी। निर्माण शुरू होने से पहले भागीदार कंपनियों को इक्विटी, स्वामित्व और क्षमता संबंधी प्रतिबद्धताओं पर सहमति बनानी होगी। साझा सुविधाओं का संचालन निष्पक्ष और भेदभाव रहित पहुंच के सिद्धांत पर किया जाएगा। यदि किसी कंपनी के हिस्से की क्षमता का उपयोग नहीं होता है, तो उसे अन्य इच्छुक कंपनियों के लिए उपलब्ध कराना होगा। इस मद में सहायता चार बराबर किस्तों में दी जाएगी। प्रत्येक किस्त 25 प्रतिशत होगी और भुगतान निर्माण की निर्धारित प्रगति तथा परियोजना के चालू होने से जुड़ा रहेगा। लागत बढ़ने या परियोजना में देरी होने पर सहायता राशि अपने आप नहीं बढ़ेगी। निर्धारित लक्ष्यों में लगातार चूक या धन के दुरुपयोग की स्थिति में भुगतान रोका जा सकता है और पहले जारी की गई राशि की वसूली भी की जा सकती है। परियोजनाओं के प्रस्तावों को सार्वजनिक निवेश बोर्ड की प्रक्रिया से गुजरना होगा, जिसके बाद संबंधित मंत्री व्यय को मंजूरी देंगे। योजना के तीसरे हिस्से में तेल एवं गैस उद्योग के लिए विनिर्माण और सेवा क्षेत्र विकसित करने का प्रस्ताव है। इन क्षेत्रों में बिजली-पानी जैसी सुविधाओं, जहाजों के ठहराव और माल चढ़ाने-उतारने के लिए जेटी, गोदाम तथा परीक्षण एवं प्रमाणन प्रयोगशालाओं जैसी सुविधाएं विकसित की जाएंगी।

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