दीपावली की रात सिर्फ दीये नहीं जलते, उम्मीदें भी रोशन होती हैं। कोई नए सपनों के स्वागत में देहरी सजाता है तो कोई बीते दिनों की उदासी को पीछे छोड़कर नई शुरुआत की तैयारी करता है। बाजारों में चमकते आभूषण, सजे प्रतिष्ठान और खरीदारी की चहल-पहल इस पर्व का बाहरी आकर्षण हैं, लेकिन इसकी असली रोशनी उन भावनाओं में छिपी है, जिन्हें कोई बाजार खरीद नहीं सकता। समृद्धि की हमारी पारंपरिक अवधारणा बड़ी दिलचस्प है। इसमें धन के साथ धरती की उर्वरता, श्रम की प्रतिष्ठा, परिवार का अपनापन, रिश्तों की मिठास और विचारों की उदारता भी शामिल है। जिस घर में बुजुर्गों का सम्मान हो, बच्चों के सपनों को पंख मिलें, जरूरतमंद के लिए भोजन का इंतजाम हो और किसी के हिस्से का उजाला न छीना जाए, वहां खुशहाली का अर्थ तिजोरी से कहीं बड़ा हो जाता है। दीपावली हमें एक और जरूरी बात सिखाती है। अंधेरा कितना भी गहरा हो, एक छोटा-सा दीप उसे चुनौती देने के लिए काफी है। यही जीवन का दर्शन भी है। निराशा के बीच आशा, कटुता के बीच क्षमा और स्वार्थ के बीच सहयोग का एक छोटा प्रयास भी समाज का वातावरण बदल सकता है। इस बार दीप जलाते समय एक संकल्प भी जगाएं। किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने का, किसी भूखे को भोजन कराने का और अपने भीतर की नकारात्मकता को विदा करने का। क्योंकि त्योहार की सार्थकता घर कितना चमका, इससे नहीं; उससे कितने जीवन रोशन हुए, इससे तय होती है
श्रीसूक्त का प्रसिद्ध मंत्र है—
हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
अर्थात हे अग्निदेव! स्वर्णिम आभा वाली, सोने-चांदी के आभूषणों से सुशोभित और चंद्रमा जैसी कांतिमयी लक्ष्मी का मेरे लिए आवाहन करें। वैदिक साहित्य की यही 'श्री' आगे चलकर पुराणों में महालक्ष्मी के विस्तृत स्वरूप में प्रतिष्ठित हुई। यहां समृद्धि केवल भौतिक साधनों की उपलब्धता नहीं, बल्कि जीवन में मंगल और संतुलन की उपस्थिति भी है। मतलब साफ है अमावस्या की रात जब लाखों दीप अंधकार को चुनौती देते हैं, तब दीपावली केवल घर-आंगन सजाने का उत्सव नहीं रह जाती, बल्कि जीवन को नए सिरे से देखने का अवसर बन जाती है। बाजारों में धन की खनक, घरों में लक्ष्मी-गणेश की पूजा और आसमान में आतिशबाजी के बीच यह पर्व एक बड़ा सवाल भी छोड़ जाता है—क्या हमारा मन भी उतना ही उजला है, जितना घरों का कोना-कोना? भारतीय परंपरा में लक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं, बल्कि समृद्धि के व्यापक भाव की प्रतीक हैं। अष्टलक्ष्मी की अवधारणा बताती है कि अन्न, साहस, ज्ञान, धैर्य, संतान, विजय और आध्यात्मिक चेतना भी जीवन की संपदा हैं। धन के साथ विवेक और ज्ञान का संतुलन ही वास्तविक वैभव है। इसीलिए लक्ष्मी के साथ गणेश की आराधना का भी विशेष महत्व है। दीपक की लौ हमें सत्य, तप, दया और क्षमा का संदेश देती है। यह याद दिलाती है कि बाहर के अंधकार से लड़ने के साथ भीतर के अहंकार, लोभ, ईर्ष्या और भेदभाव को मिटाना भी जरूरी है। किसी जरूरतमंद के घर में खुशियां पहुंचाना, श्रमिक के परिश्रम का सम्मान करना और किसी निराश चेहरे पर मुस्कान लाना भी दीपावली की रोशनी है। इस बार दीप जलें तो एक संकल्प भी जगे—समृद्धि केवल अपनी तिजोरी तक सीमित न रहे, उसका उजाला समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। क्योंकि सच्ची दीपावली वही है, जिसमें घर के साथ मन और मन के साथ पूरा समाज प्रकाशित हो।
दीपों के उत्सव में समृद्धि, संस्कार और आत्मजागरण का संदेश
तिजोरी में धन, घर में रोशनी और मन में संतोष—दीपावली का अर्थ इन तीनों के संतुलन में छिपा है। यह पर्व केवल लक्ष्मी के आगमन की कामना नहीं, बल्कि जीवन को समृद्ध, विचारों को उदार और समाज को संवेदनशील बनाने का अवसर भी है। दीपावली की रात जब घरों की देहरी पर दीप जलते हैं, मंदिरों में घंटियां गूंजती हैं और आकाश रोशनी से भर उठता है, तब यह उत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रह जाता। वह भारतीय जीवन-दृष्टि का ऐसा सांस्कृतिक उत्सव बन जाता है, जिसमें आस्था, अर्थ, ज्ञान, परंपरा और लोकमंगल के अनेक रंग एक साथ दिखाई देते हैं। सदियों से मनाया जा रहा यह पर्व हर वर्ष एक नया प्रश्न हमारे सामने रखता है—क्या हमने केवल अपने घरों को रोशन किया है या अपने भीतर भी कोई दीप जलाया है? दीपावली का सांस्कृतिक विस्तार इतना व्यापक है कि इसके अर्थ को किसी एक कथा, एक पूजा या एक परंपरा तक सीमित नहीं किया जा सकता। अलग-अलग क्षेत्रों में इसके साथ अनेक धार्मिक मान्यताएं और लोकपरंपराएं जुड़ी हैं। उत्तर भारत में इसे भगवान राम के अयोध्या लौटने की स्मृति से जोड़कर देखा जाता है। परंपरा के अनुसार, चौदह वर्ष के वनवास और रावण पर विजय के बाद अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। जैन परंपरा में यह भगवान महावीर के निर्वाण से जुड़ा पावन अवसर है, जबकि कुछ अन्य परंपराओं में इसे अलग-अलग धार्मिक प्रसंगों और साधना से जोड़ा जाता है। यही विविधता दीपावली को भारतीय संस्कृति का साझा उत्सव बनाती है।
अंधकार से प्रकाश तक की हजारों वर्ष पुरानी चेतना
भारतीय चिंतन में प्रकाश केवल भौतिक उजाले का प्रतीक नहीं रहा। वह ज्ञान, सत्य, विवेक और चेतना का भी बिंब है। उपनिषदों की प्रार्थना—'तमसो मा ज्योतिर्गमय' अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो—इसी जीवन-दृष्टि को अभिव्यक्त करती है। यहां अंधकार का अर्थ केवल रात नहीं, बल्कि अज्ञान, भ्रम, अन्याय और अविवेक भी है। वैदिक साहित्य में 'श्री' और समृद्धि की अवधारणा के उल्लेख मिलते हैं। समय के साथ लक्ष्मी का स्वरूप भारतीय धार्मिक और कलात्मक परंपराओं में अधिक स्पष्ट होता गया। समुद्र मंथन से लक्ष्मी के प्रकट होने का प्रसंग पुराणों में वर्णित है। इसे धार्मिक आस्था और पौराणिक परंपरा के रूप में देखा जाता है। प्राचीन भारतीय कला में भी लक्ष्मी की उपस्थिति के प्रमाण मिलते हैं। भरहुत जैसे पुरास्थलों की कला में देवी से जुड़े रूपांकन और बाद के काल की मूर्तियों तथा सिक्कों में लक्ष्मी के चित्रण से पता चलता है कि समृद्धि और सौभाग्य की यह अवधारणा भारतीय समाज में लंबे समय से प्रतिष्ठित रही है। दीपावली का स्वरूप भी समय के साथ विकसित हुआ। कहीं यह फसल और समृद्धि का उत्सव बनी, कहीं व्यापारिक वर्ष की शुरुआत का अवसर, तो कहीं धार्मिक साधना और पारिवारिक मिलन का पर्व। इसीलिए दीपावली केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि बदलते समाज के साथ आगे बढ़ती सांस्कृतिक परंपरा भी है।
पांच दिनों में जीवन के पांच संदेश
दीपावली का उत्सव सामान्यतः पांच दिनों तक विस्तृत रहता है। धनतेरस से शुरू होकर नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज तक इसकी प्रत्येक कड़ी का अपना धार्मिक और सामाजिक महत्व है। धनतेरस पर आरोग्य और समृद्धि की कामना की जाती है। नरक चतुर्दशी बुराई पर अच्छाई की विजय का स्मरण कराती है। अमावस्या की रात दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश की पूजा होती है। गोवर्धन पूजा प्रकृति, पशुधन और कृषि के महत्व को रेखांकित करती है, जबकि भाई दूज भाई-बहन के स्नेह और पारिवारिक संबंधों की गरिमा को सामने लाती है। इन परंपराओं के भीतर जीवन के अलग-अलग पक्ष समाहित हैं—स्वास्थ्य, संपन्नता, सद्बुद्धि, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और रिश्तों की आत्मीयता। यही कारण है कि दीपावली केवल पूजा-पाठ का पर्व नहीं, बल्कि परिवार और समाज को जोड़ने वाला उत्सव भी है।
अष्टलक्ष्मी : समृद्धि के आठ आयाम
दीपावली पर मां लक्ष्मी की आराधना का विशेष महत्व है। सामान्य धारणा में लक्ष्मी को धन और वैभव की देवी के रूप में देखा जाता है, लेकिन भारतीय धार्मिक परंपरा में उनका स्वरूप इससे कहीं अधिक व्यापक है। अष्टलक्ष्मी की अवधारणा समृद्धि के आठ आयामों को सामने रखती है। आदि लक्ष्मी आध्यात्मिक आधार और मूल चेतना का प्रतीक हैं। धन लक्ष्मी आर्थिक संपन्नता का भाव जगाती हैं। धान्य लक्ष्मी अन्न और कृषि की समृद्धि से जुड़ी हैं। धैर्य लक्ष्मी कठिन परिस्थितियों में साहस और धीरज का संदेश देती हैं। गज लक्ष्मी प्रतिष्ठा, वैभव और राजकीय समृद्धि का प्रतीक मानी जाती हैं। संतान लक्ष्मी परिवार और संतति के कल्याण से जुड़ी हैं। विजय लक्ष्मी संघर्षों में सफलता और बाधाओं पर विजय का भाव जगाती हैं, जबकि विद्या लक्ष्मी ज्ञान और विवेक की महत्ता बताती हैं। इन आठ स्वरूपों का संदेश स्पष्ट है—समृद्धि का अर्थ केवल बैंक खाते या तिजोरी में बढ़ती रकम नहीं है। स्वस्थ शरीर, पर्याप्त अन्न, ज्ञान, धैर्य, परिवार, प्रतिष्ठा और आत्मबल भी जीवन की संपदा हैं। जिस घर में धन तो हो, लेकिन शांति न हो; वैभव हो, लेकिन विवेक न हो; साधन हों, लेकिन संतोष न हो, वहां समृद्धि का अर्थ अधूरा रह जाता है।
धन के साथ धर्म और विवेक का संतुलन
भारतीय दर्शन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को जीवन के चार पुरुषार्थ माना गया है। इनमें अर्थ यानी धन और संसाधनों की प्राप्ति को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। लेकिन अर्थ को धर्म से अलग नहीं रखा गया। धन कमाना आवश्यक है, मगर उसके अर्जन का रास्ता और उपयोग उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। रावण और दुर्योधन जैसे पात्रों के पास अपार वैभव था, लेकिन उनका अहंकार और अधर्म उनके पतन का कारण बना। दूसरी ओर, वनवास और संघर्ष के बीच राम तथा पांडवों के जीवन में मर्यादा, सत्य और धर्म का महत्व दिखाई देता है। इन प्रसंगों का आशय यही है कि संपत्ति अपने आप में न तो पुण्य है और न पाप; उसका मूल्य इस बात से तय होता है कि उसे किस तरह अर्जित किया गया और उसका उपयोग किसके हित में हुआ। आज जब सफलता का पैमाना अक्सर संपत्ति, पद और प्रदर्शन से तय होने लगा है, तब दीपावली हमें ठहरकर सोचने का अवसर देती है। क्या हमारी समृद्धि किसी दूसरे के शोषण पर खड़ी है? क्या हमारे संसाधनों से समाज के कमजोर वर्ग को भी लाभ पहुंचता है? क्या धन के साथ हमारे भीतर उदारता और जिम्मेदारी भी बढ़ रही है? लक्ष्मी की आराधना का वास्तविक अर्थ तभी व्यापक होगा, जब समृद्धि के साथ नैतिकता और लोककल्याण का भाव भी जुड़ा हो।
लक्ष्मी के साथ गणेश और सरस्वती का भी महत्व
दीपावली पर लक्ष्मी के साथ गणेश की पूजा की परंपरा भी विशेष अर्थ रखती है। लक्ष्मी जहां समृद्धि का प्रतीक हैं, वहीं गणेश विवेक, बुद्धि और विघ्नों को दूर करने की कामना से जुड़े हैं। कई परंपराओं में सरस्वती को भी ज्ञान और विद्या की अधिष्ठात्री के रूप में स्मरण किया जाता है। यह प्रतीकात्मक संगति बताती है कि धन को सही दिशा देने के लिए बुद्धि और ज्ञान जरूरी हैं। आज शिक्षा का उद्देश्य कई बार केवल नौकरी और आय अर्जित करने तक सीमित होता दिखाई देता है। जबकि ज्ञान मनुष्य को संवेदनशील बनाता है, सही-गलत का विवेक देता है और समाज के प्रति जिम्मेदारी का बोध कराता है। केवल धनवान होना पर्याप्त नहीं, विवेकवान होना भी जरूरी है। धन अवसर दे सकता है, लेकिन उसका सदुपयोग ज्ञान और संस्कार ही सिखाते हैं।
दीपक की लौ में छिपा जीवन-दर्शन
एक प्रचलित आध्यात्मिक उक्ति में दीपक को मानवीय गुणों का प्रतीक बताया गया है— 'सत्याधारस्तपस्तैलं दयावर्तिः क्षमा शिखा।' अर्थात सत्य दीपक का आधार है, तप उसका तेल, दया उसकी बाती और क्षमा उसकी लौ। इस प्रतीक में जीवन को प्रकाशित करने का पूरा दर्शन समाहित है। सत्य के बिना चरित्र का आधार कमजोर पड़ता है, तप के बिना संकल्प टिकता नहीं, दया के बिना समाज संवेदनहीन हो जाता है और क्षमा के बिना रिश्तों में स्थायित्व नहीं रहता। दीपावली के दीप हमें इसी आंतरिक प्रकाश की याद दिलाते हैं। घर में सैकड़ों दीप जलाने के बाद भी यदि मन में ईर्ष्या, द्वेष और अहंकार का अंधेरा है तो उत्सव की सार्थकता अधूरी है। राम के अयोध्या लौटने की स्मृति के साथ अपने भीतर के रावण को पहचानना भी जरूरी है। वह रावण जो कभी अहंकार बनकर, कभी लोभ बनकर, कभी अन्याय और कभी भेदभाव बनकर हमारे व्यवहार में उतर आता है।
समरस समाज में ही पूर्ण होगा प्रकाश
दीपावली का उजाला तभी सार्थक होगा, जब वह समाज के हर वर्ग तक पहुंचे। जिस उत्सव में घरों की देहरी रोशन हो, लेकिन किसी पड़ोसी के घर में अभाव का अंधेरा पसरा रहे, वहां संवेदना की जरूरत बनी रहती है। किसी जरूरतमंद परिवार की सहायता करना, श्रमिकों के परिश्रम का सम्मान करना, अकेले रह रहे बुजुर्गों के साथ समय बिताना या किसी बच्चे की शिक्षा में सहयोग देना भी दीपावली का सुंदर रूप हो सकता है। राम के वनवास प्रसंग में वनवासी समाज और सहयोगियों की भूमिका को भी इसी दृष्टि से देखा जा सकता है। सामूहिक प्रयास से ही कठिन लक्ष्य हासिल होते हैं। जिस तरह एक दीप से दूसरा दीप जलता है और पहले दीप का प्रकाश कम नहीं होता, उसी तरह ज्ञान, प्रेम और सहयोग बांटने से घटते नहीं, बल्कि बढ़ते हैं। जाति, वर्ग, भाषा और आर्थिक हैसियत के आधार पर खड़ी दीवारें समाज के उजाले को सीमित करती हैं। दीपावली हमें समानता, सम्मान और सहअस्तित्व का संकल्प लेने की प्रेरणा देती है। उत्सव की असली चमक महंगे उपहारों या भव्य सजावट में नहीं, बल्कि उस आत्मीयता में है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है।
स्वच्छता और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी
दीपावली से पहले घरों की सफाई की परंपरा है। पुराने और अनुपयोगी सामान को हटाकर घर को नया रूप दिया जाता है। इस परंपरा का एक प्रतीकात्मक अर्थ यह भी है कि मन से कटुता, ईर्ष्या और पूर्वाग्रह को हटाया जाए। लेकिन स्वच्छता का संकल्प केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। घर को चमकाने के बाद सड़क पर कचरा फेंकना, सार्वजनिक स्थानों को गंदा करना और नदियों को प्रदूषित करना हमारी सोच में विरोधाभास को उजागर करता है। उत्सव प्रकृति की कीमत पर नहीं होना चाहिए। संयमित आतिशबाजी, कम प्रदूषण, मिट्टी के दीपों का उपयोग और कचरे का उचित निस्तारण ऐसे छोटे कदम हैं, जिनसे त्योहार अधिक जिम्मेदार बन सकता है। गोवर्धन पूजा की परंपरा भी प्रकृति, पशुधन और कृषि के प्रति कृतज्ञता का संदेश देती है। आधुनिक समय में इसका महत्व और बढ़ जाता है, जब पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग पूरी दुनिया के सामने बड़ी चुनौती है।
दीप से दृष्टि तक का सफर
दीपावली का वास्तविक अर्थ केवल अंधेरी रात को रोशन करना नहीं, बल्कि जीवन की दिशा को प्रकाशित करना है। लक्ष्मी के आठ स्वरूप हमें बताते हैं कि समृद्धि बहुआयामी है। गणेश और सरस्वती का स्मरण धन के साथ विवेक और ज्ञान की जरूरत समझाता है। दीपक की लौ सत्य, तप, दया और क्षमा का महत्व बताती है। वहीं सामाजिक परंपराएं हमें रिश्तों, प्रकृति और सामूहिक जिम्मेदारी से जोड़ती हैं। इसलिए इस दीपावली एक दीप घर की देहरी पर जलाएं और एक दीप अपने अंतर्मन में भी। ऐसा दीप, जो किसी के प्रति द्वेष को मिटाए, किसी जरूरतमंद के जीवन में उम्मीद जगाए, किसी बच्चे के लिए ज्ञान का रास्ता खोले और किसी टूटते रिश्ते में संवाद की शुरुआत करे। क्योंकि रोशनी का उत्सव तभी पूर्ण होगा, जब दीपों के साथ दृष्टि भी प्रकाशित होगी; जब घरों के साथ विचार भी जगमगाएंगे और जब व्यक्ति की समृद्धि समाज के कल्याण से जुड़ेगी। यही दीपावली का शाश्वत संदेश है—समृद्धि ऐसी हो जिसमें संस्कार हों, वैभव ऐसा हो जिसमें विवेक हो और उजाला ऐसा हो जो सबके हिस्से आए।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी


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