वाराणसी : दीपों का महासमर : काशी से अयोध्या तक जगमगा रहा भारत - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 7 नवंबर 2026

वाराणसी : दीपों का महासमर : काशी से अयोध्या तक जगमगा रहा भारत

  • दीपों से दमकी देवभूमि, आस्था के उजास में नहाया भारत

अयोध्या में 30 लाख दीपों से सजी रामनगरी, काशी में बाबा विश्वनाथ और मां अन्नपूर्णा के दरबार में उमड़ी आस्था

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भारत की सांस्कृतिक चेतना जब प्रकाश का उत्सव मनाती है, तब दीप केवल घरों की देहरी पर नहीं जलते, वे इतिहास, आस्था, परंपरा और राष्ट्रीय अस्मिता के पन्नों पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ते हैं। कार्तिक अमावस्या की पूर्व संध्या पर इस बार भारत का दृश्य कुछ ऐसा ही है। कृष्ण की मथुरा से राम की अयोध्या तक, महाकाल की उज्जयिनी से बाबा विश्वनाथ की काशी तक और दक्षिण के रामेश्वरम से उत्तर के हिमालयी तीर्थों तक दीपों की उजास भारतीय सभ्यता के विराट स्वरूप को अभिव्यक्त कर रही है। यह केवल दीपावली का उल्लास नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक निरंतरता का उत्सव है, जिसने हजारों वर्षों से भारत को एक सूत्र में बांधे रखा है।


अयोध्या में दीपों का महासमर, रामनगरी पर दुनिया की निगाहें

इस बार दीपावली की सबसे बड़ी सांस्कृतिक तस्वीर प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या से सामने आई है। दसवें दीपोत्सव पर सरयू के 56 घाटों को 30 लाख से अधिक मिट्टी के दीपों से आलोकित करने का भव्य आयोजन किया गया। वर्ष 2017 में लगभग 1.71 लाख दीपों से शुरू हुई यह यात्रा आज वैश्विक सांस्कृतिक आयोजन का रूप ले चुकी है। इस बार दीपोत्सव में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन, राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी ने आयोजन की गरिमा बढ़ाई। सरयू तट पर दीप प्रज्वलन के साथ रामनगरी ने एक बार फिर दुनिया को अपनी सांस्कृतिक विरासत का विराट परिचय दिया। 2100 स्वदेशी ड्रोन के माध्यम से आकाश में रामायण के प्रसंगों का सजीव चित्रण, लेजर शो, प्रोजेक्शन मैपिंग और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने परंपरा और आधुनिक तकनीक का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया। 2151 वेदाचार्यों की महाआरती और रामायण के प्रसंगों पर आधारित झांकियों ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। यहां दीपों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण वह भाव था, जिसमें करोड़ों लोगों की आस्था एक साथ प्रतिबिंबित हो रही थी। अयोध्या का यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पर्यटन, स्थानीय रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने का माध्यम भी बन रहा है। दीप बनाने वाले कुम्हारों से लेकर कलाकारों, शिल्पकारों और छोटे कारोबारियों तक इस आयोजन ने परंपरागत हुनर को नया मंच दिया है। यही दीपोत्सव की वास्तविक उपलब्धि है कि आधुनिकता की चमक के बीच मिट्टी के दीये और पारंपरिक कारीगरी की महत्ता भी बढ़ रही है।


काशी : जहां दीपों में बसती है शिव और शक्ति की चेतना

अयोध्या में राममय वातावरण के बीच काशी अपनी विशिष्ट आध्यात्मिक आभा के साथ दीपावली के स्वागत में तैयार है। यह वह नगरी है, जहां जीवन और मृत्यु, लोक और परलोक तथा शिव और शक्ति की अवधारणाएं एक साथ सांस लेती हैं। यहां दीपावली का अर्थ केवल लक्ष्मी पूजन नहीं, बल्कि बाबा विश्वनाथ और मां अन्नपूर्णा के प्रति कृतज्ञता का भाव भी है। धनतेरस पर काशी ने आस्था का ऐसा दृश्य देखा, जिसने एक बार फिर इस नगरी की धार्मिक प्रतिष्ठा को रेखांकित किया। मां अन्नपूर्णा के स्वर्णमयी स्वरूप के दर्शन के लिए सुबह पांच बजे से रात 11:30 बजे तक श्रद्धालुओं की कतार लगी रही। इस दौरान दो लाख से अधिक भक्तों ने दर्शन किए। बांसफाटक, गोदौलिया, कचौड़ी गली और विश्वनाथ धाम के गेट नंबर चार तक श्रद्धालुओं की लंबी कतारें रहीं। देश की खुशहाली और कोई भूखा न सोए, इसी मंगलकामना के साथ मां के दरबार में विशेष पूजन हुआ। बाबा विश्वनाथ के दरबार में भी पर्व की तैयारियों के बीच श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी हुई है। मंदिर परिसर की सजावट, विशेष पूजन और धार्मिक अनुष्ठान काशी की परंपरा को जीवंत कर रहे हैं। मां अन्नपूर्णा के स्वर्णमयी स्वरूप के दर्शन का सिलसिला 10 नवंबर तक चलेगा। इसी दिन अन्नकूट महोत्सव में मां को विशाल भोग अर्पित किया जाएगा। यह परंपरा काशी के उस सनातन संदेश को दोहराती है, जिसमें अन्न को ब्रह्म और अन्नदान को सबसे बड़ा पुण्य माना गया है।


गंगा के घाटों से घरों की देहरी तक प्रकाश का उत्सव

काशी में दशाश्वमेध, अस्सी, पंचगंगा, राजघाट और अन्य गंगा घाटों पर दीपदान की परंपरा दीपावली को विशिष्ट बनाती है। गंगा की लहरों पर तैरते दीप मानो मनुष्य की प्रार्थनाओं को अपने साथ लेकर अनंत की ओर बढ़ते हैं। मंदिरों की घंटियां, शंखनाद, आरती के स्वर और गलियों में जगमगाती रोशनी इस नगरी को एक आध्यात्मिक उत्सव में बदल देती है। रविवार, 8 नवंबर को दीपावली के अवसर पर घर-घर लक्ष्मी-गणेश पूजन होगा। व्यापारी नए बहीखातों का शुभारंभ करेंगे। घरों के आंगन में रंगोली सजेगी और मिट्टी के दीये सुख-समृद्धि की कामना के साथ प्रज्वलित होंगे। काशी में दीपावली के बाद 10 नवंबर को अन्नकूट का आयोजन भी विशेष आकर्षण रहेगा। इसके बाद 24 नवंबर को देव दीपावली पर गंगा के घाटों पर दीपों का एक और विराट उत्सव सजेगा। इस तरह काशी में प्रकाश पर्व की यह श्रृंखला एक दिन तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे कार्तिक मास की आध्यात्मिक यात्रा है।  


बाजारों में लक्ष्मी की दस्तक, मिट्टी के दीयों से स्वदेशी का संदेश

दीपावली का उल्लास मंदिरों और घाटों से निकलकर बाजारों तक पहुंचता है। काशी के गोदौलिया, चौक, ठठेरी बाजार, विश्वेश्वरगंज, लहुराबीर और आसपास के बाजारों में त्योहार की रौनक दिखाई दे रही है। गणेश-लक्ष्मी की प्रतिमाओं, मिट्टी के दीयों, रंग-बिरंगी झालरों, फूलों, मिठाइयों और सजावटी सामान की दुकानों पर ग्राहकों की आवाजाही बढ़ी है। धनतेरस पर बर्तन, आभूषण और चांदी के सामान की खरीदारी ने कारोबार को गति दी। हल्के गहनों और चांदी के बर्तनों के साथ डिजाइनर दीयों और पारंपरिक मूर्तियों की मांग भी चर्चा में रही। यह पर्व छोटे व्यापारियों, कुम्हारों, शिल्पकारों और घरेलू उद्यमों के लिए उम्मीद की नई किरण लेकर आता है। मिट्टी का दीया खरीदना केवल एक वस्तु खरीदना नहीं, बल्कि उस कुम्हार के श्रम और परंपरा को सम्मान देना है, जिसकी पीढ़ियां इसी कला के सहारे जीवनयापन करती आई हैं। 'वोकल फॉर लोकल' की भावना तभी सार्थक होगी, जब त्योहार की खरीदारी में स्थानीय कारीगर और उत्पाद प्राथमिकता पाएंगे।


दीपावली का अर्थ : बाहर ही नहीं, भीतर भी उजाला

दीपावली का सबसे गहरा अर्थ उसके आध्यात्मिक दर्शन में छिपा है। उपनिषदों की प्रार्थना 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का आह्वान करती है। यहां अंधकार केवल रात का नहीं, बल्कि अज्ञान, अहंकार, लोभ, ईर्ष्या और वैमनस्य का भी प्रतीक है। दीपक की लौ हमें सिखाती है कि परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, अपने भीतर आशा और विवेक का प्रकाश जीवित रखना चाहिए। प्रभु श्रीराम का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटना इसी विश्वास का प्रतीक है कि अंततः मर्यादा, सत्य और धर्म की विजय होती है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की परंपरा भी बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देती है। अलग-अलग क्षेत्रों में दीपावली से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं भिन्न हो सकती हैं, लेकिन उनका मूल भाव एक ही है—असत्य पर सत्य और अंधकार पर प्रकाश की विजय।


उत्सव की सार्थकता दूसरों के जीवन में रोशनी भरने में

दीपावली की वास्तविक सुंदरता तब पूरी होती है, जब इसकी रोशनी समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। किसी जरूरतमंद के घर दीप जलाना, किसी भूखे को भोजन कराना, किसी निराश व्यक्ति के जीवन में उम्मीद जगाना और शहीदों के बलिदान को याद करना भी इस पर्व की आत्मा है। पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाते हुए मिट्टी के दीयों को अपनाना, अनावश्यक प्रदूषण से बचना और उत्सव को संवेदनशील बनाना समय की मांग है। आज जब अयोध्या के सरयू तट पर लाखों दीप एक साथ प्रज्वलित हो रहे हैं और काशी में मां अन्नपूर्णा के दरबार से लेकर गंगा के घाटों तक आस्था का प्रकाश फैल रहा है, तब भारत की सांस्कृतिक एकात्मता सहज ही दिखाई देती है। यह विविधताओं को मिटाने का नहीं, बल्कि उन्हें एक साझा सांस्कृतिक चेतना में पिरोने का उत्सव है। काशी से अयोध्या तक फैली यह दीपमालिका हमें याद दिलाती है कि भारत की असली शक्ति उसकी विरासत, संस्कार, सहिष्णुता और सामूहिक विश्वास में निहित है। दीप जलाना सरल है, लेकिन किसी के जीवन से अंधकार मिटाना उससे कहीं बड़ा संकल्प है। इस दीपावली पर जरूरत केवल घरों को रोशन करने की नहीं, मन के भीतर संवेदना, समाज में सद्भाव और राष्ट्रजीवन में नैतिकता की ज्योति प्रज्वलित करने की है। क्योंकि दीपों का महासमर तभी सार्थक होगा, जब हर घर में उजाला हो, हर चेहरे पर मुस्कान हो और किसी की जिंदगी अंधेरे में न रहे।




सुरेश गांधी

वरिष्ठ पत्रकार 

वाराणसी

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