सोनिया ने अपनी पुस्तक ‘बिलॉन्गिंग : ए जर्नी ऑफ लव’ में लिखा है कि राजनीति में उतरने की अपील करने वालों की बात वह चुपचाप सुनती थीं, लेकिन उनकी बात पर अमल नहीं करती थीं। इस पुस्तक के कुछ अंश ‘द हिंदू’ में प्रकाशित हुए थे। उन्होंने कहा कि 1996 के चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए निराशाजनक रहे थे, क्योंकि पार्टी अपने दम पर सरकार बनाने में सफल नहीं हो पाई थी। उस समय पार्टी टूट और गुटबाजी से जूझ रही थी। सोनिया ने लिखा, ‘‘वर्ष 1995 में मुझसे एक खास गुट का समर्थन करने को कहा गया था। इस गुट के प्रमुख नेताओं में अर्जुन सिंह, एन.डी. तिवारी और मोहसिना किदवई शामिल थे। वे दशकों से पार्टी के सदस्य थे और महत्वपूर्ण पदों तथा मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके थे। मैंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। वे पार्टी से अलग हो गए और उन्होंने एक नया दल बना लिया। अगले साल वरिष्ठ तमिल नेताओं जी.के. मूपनार और पी. चिदंबरम के साथ कांग्रेस के युवा सदस्य माधवराव सिंधिया ने भी पार्टी छोड़ दी। सिंधिया 1980 में कांग्रेस में शामिल हुए थे। इन सभी ने अलग-अलग पार्टियां बना लीं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘वर्ष 1997 में राज्य नेतृत्व से मतभेदों के कारण ममता बनर्जी ने पार्टी छोड़ दी और अपनी अलग पार्टी तृणमूल कांग्रेस बना ली। मैं 1997 में कांग्रेस की प्राथमिक सदस्य बनी थी। उस समय पार्टी अध्यक्ष सीताराम केसरी ने मुझे कलकत्ता में पार्टी के 80वें महाधिवेशन में आमंत्रित किया था। लेकिन पार्टी की स्थिति लगातार बिगड़ती दिख रही थी और उसका नेतृत्व संभालने के लिए मुझ पर दबाव बढ़ता जा रहा था।’’ ‘हार्पर कॉलिन्स इंडिया’ द्वारा प्रकाशित और जल्द ही जारी होने वाली इस पुस्तक में सोनिया ने कहा है कि वह कांग्रेस में चल रही घटनाओं को लेकर बेचैन रहने लगी थीं और पार्टी के भविष्य को लेकर चिंतित थीं। उन्हें याद है कि मीडिया में प्रकाशित लेखों में पार्टी के भविष्य की निराशाजनक तस्वीर पेश की जा रही थी। उन्होंने लिखा, ‘‘जब भी मैं राजीव और अपनी सास की तस्वीरों के सामने से गुजरती थी, तो पीड़ा और अपराधबोध का मिला-जुला एहसास मुझे घेर लेता था। उस समय मैं जानबूझकर उनकी तस्वीरों की ओर देखने से भी बचती थी।’’
सोनिया गांधी ने कहा कि जिस भारत से उनका जुड़ाव था, उससे उनका परिचय उनके पति और सास के माध्यम से हुआ था। कांग्रेस की सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहीं सोनिया ने कहा कि जिन ताकतों के खिलाफ उनके पति और सास ने भारत की बहुलतावादी भावना की रक्षा के लिए दशकों तक संघर्ष किया था, वे अब ऐसे रास्ते पर चल पड़ी थीं, जिससे देश को अपूरणीय क्षति पहुंचती। उन्होंने कहा, ‘‘मैं घर पर आराम से कैसे बैठ सकती थी और उनके काम तथा बलिदानों को व्यर्थ कैसे जाने दे सकती थी।’’ सोनिया गांधी ने अपनी पुस्तक में लिखा है, ‘‘मैं बेहद व्यथित थी। आधी रात को मेरी नींद खुल जाती और मैं सोचती रहती कि मुझे क्या करना चाहिए, मुझे किस रास्ते पर जाना चाहिए। क्या मैंने जीवन के हर कदम पर राजनीति में आने का विरोध नहीं किया था? क्या राजनीति ने मुझसे पहले मेरी सास और फिर मेरी जिंदगी के प्यार, मेरे बच्चों के पिता को बेरहमी से नहीं छीन लिया था? आखिर क्यों, क्यों मेरे भीतर मुझसे की जा रही अपील का जवाब देने की इतनी प्रबल इच्छा जाग रही थी?’’ उन्होंने लिखा, ‘‘मुझे राजनीति हमेशा से नापसंद थी, यहां तक कि उन सभी वर्षों में भी जब राजीव सार्वजनिक जीवन में थे। लेकिन अब मैं समझने लगी थी कि किस चीज ने उन्हें राजनीति की ओर खींचा था, जिसका मैंने उस समय पुरजोर विरोध किया था। वह थी अपनी मां और अपने देश के प्रति कर्तव्य की पुकार। अब वही पुकार मुझे अपनी ओर खींच रही थी। इससे मैं डर जाती थी। मैंने इसका विरोध करने की कोशिश की, लेकिन यह बार-बार मुझे बेचैन करने लौट आती थी।’’
उन्होंने कहा, ‘‘मैं अपने ही भीतर अंतर्द्वंद्व में फंसी हुई थी। मेरा एक हिस्सा राजनीति की दुनिया से दूर रहना चाहता था, क्योंकि सत्ता के खेल के साथ हर जगह महत्वाकांक्षा और लालच, पाखंड और विश्वासघात अनिवार्य रूप से जुड़े होते हैं।’’ सोनिया ने पुस्तक में लिखा, ‘‘लेकिन मैं उन आंतरिक बाध्यताओं को नकार नहीं पा रही थी, जो बचपन से मेरे मन में गहराई तक बैठा दी गई थीं-सौंपे गए कामों को पूरी लगन से करना, बड़ों का सम्मान करना, माता-पिता की आज्ञा मानना और पारिवारिक परंपराओं के प्रति निष्ठावान रहना।’’ उन्होंने कहा, ‘‘ये बातें मुझे लगातार भीतर ही भीतर कचोट रही थीं। मेरा कर्तव्य कहां था, यह मुझे स्पष्ट था; लेकिन उस कर्तव्य का पालन करने का क्या अर्थ होगा, यही बात मुझे भयभीत कर रही थी।’’ उन्होंने कहा कि यह संघर्ष अनिद्रा भरी रातों और बेचैनी वाले दिनों के बीच जारी रहा। सोनिया ने लिखा, ‘‘मैं बेहद व्यथित और अकेली महसूस कर रही थी। मैं किसी ऐसी चीज की तलाश में थी, जिसका सहारा ले सकूं, किसी ऐसे व्यक्ति या चीज की, जो मेरा मार्गदर्शन कर सके और मेरे डर तथा शंकाओं से बाहर निकलने में मेरी मदद कर सके। क्या यह अवचेतन मन की ऐसी तलाश थी, जो मुझे वहां ले जाने वाली थी, जहां मुझे अपने दिल की गहराई में पहले से ही पता था कि मुझे जाना है?’’ उन्होंने लिखा, ‘‘मैं अपने पूरे वयस्क जीवन में कभी धार्मिक नहीं रही, हालांकि सभी धर्मों का सम्मान करती हूं, लेकिन इसी दौर में मुझे भगवद्गीता की ओर लौटने की इच्छा हुई। मैंने इसे बहुत कम उम्र में पढ़ा था।’’ उन्होंने लिखा, ‘‘यह प्राचीन ग्रंथ और वह महान कथा, जिसका यह हिस्सा है, हर जगह मौजूद थे और लाखों लोगों के जीवन तथा विचारों में रचे-बसे थे। मैं स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों पर इसके गहरे प्रभाव से परिचित थी। मैंने नाटकों, त्योहारों और अन्य माध्यमों से इसकी प्रस्तुतियां देखी थीं। मैंने राजनीतिक हस्तियों को अपनी बात रखने या लोगों को कुछ समझाने के लिए बार-बार इसके दोहों का पाठ करते सुना था।’’
सोनिया गांधी ने लिखा कि उन्होंने अपने कार्यालय से पता करने को कहा कि क्या कोई उन्हें घर पर गीता की कक्षाएं दे सकता है। इसके बाद प्रोफेसर वाचस्पति उपाध्याय का नाम सामने आया। सोनिया ने लिखा, ‘‘हम उन्हें शास्त्रीजी कहते थे। वह सौम्य, विनम्र और विद्वान थे तथा हमारे परिवार के परिचित भी थे।’’ सोनिया के मुताबिक, शास्त्रीजी ने अपने खाली समय में उन्हें भगवद्गीता के गहन दार्शनिक अर्थ समझाने पर सहमति जताई। उन्होंने लिखा, ‘‘जनवरी 1997 से मैंने उनके साथ नियमित अध्ययन करना शुरू किया। इसके लिए राजीव की पुस्तकों की अलमारी से चुनी गई एक पुस्तक का इस्तेमाल किया गया। यह संस्कृत संस्करण था, जिसमें प्रत्येक श्लोक के नीचे हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद दिए गए थे।’’ वह लिखती हैं, ‘‘शास्त्रीजी संस्कृत में एक-दो श्लोक पढ़ते थे, मैं हिंदी अनुवाद पढ़ती थी और फिर वह उसका अर्थ समझाते थे। हमने धीरे-धीरे शुरुआत की, लेकिन मुझे अपने कार्यालय की नियुक्ति डायरी से पता चलता है कि दिसंबर 1997 में हमारे कई सत्र हुए। इसके बाद हमारा अध्ययन नियमित गति से जारी रहा और पांच जनवरी 1998 को हमारा आखिरी अध्यन सत्र था।’’ अपने बच्चों के बारे में उन्होंने लिखा, ‘‘राहुल और प्रियंका मेरी बेचैनी से वाकिफ थे और उन्हें डर था कि कहीं मैं भी राजनीति में उतरने पर सहमत ना हो जाऊं। जिस तरह मैंने राजीव के साथ इस मुद्दे पर संघर्ष किया था, उसी तरह अब मेरे दोनों बच्चे मुझसे जोरदार बहस करते थे।’’
उन्होंने लिखा, ‘‘उनके जीवन में पहले ही अपनी दादी और पिता को खोने का दुख आ चुका था। अब हमारे परिवार में हम तीन ही लोग बचे थे। उन्होंने जोर देकर कहा था कि वे मुझे भी नहीं खोना चाहते।’’ पुस्तक के प्रकाशित अंशों के अनुसार, नए साल की छुट्टियों पर रवाना होने से पहले बच्चों ने सोनिया से वचन लिया कि वह कोई ‘सनक भरा कदम’ नहीं उठाएंगी। उन्होंने लिखा, ‘‘अब मैं अपने उथल-पुथल भरे विचारों के साथ अकेली थी। गीता का अध्ययन समाप्ति की ओर था। भगवान कृष्ण गीता का संदेश समझा चुके थे कि अपने कर्म के फल की चिंता किए बिना अपना धर्म निभाओ। पांडव राजकुमार अर्जुन कहते हैं कि उनका भ्रम अब दूर हो गया है। वह फिर से अपने वास्तविक स्वरूप में लौट आए हैं, सभी संदेहों से मुक्त और दृढ़ हैं तथा युद्ध में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं।’’ सोनिया ने आगे लिखा, ‘‘मेरे भीतर कुछ जाग उठा। मुझे पूरा विश्वास हो गया था। मुझे अपने संदेहों और सवालों का जवाब मिल गया था। मुझे बाहर निकलकर वहां जाना था, जहां मेरा कर्तव्य मुझे बुला रहा था। और मैंने ऐसा ही किया।’’ इस संस्मरण में राजीव गांधी के साथ उनकी शादी और अपनी सास एवं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से पहली मुलाकात का भी जिक्र है। इसमें भारत में जीवन के अनुरूप खुद को ढालने के उनके प्रयासों के बारे में भी बताया गया है, जिनमें हिंदी सीखना, साड़ी पहनना और भारतीय खानपान तथा संस्कृति को अपनाना शामिल है। इसमें गांधी परिवार को बदलकर रख देने वाली बड़ी त्रासदियों का भी उल्लेख है जिनमें विमान दुर्घटना में संजय गांधी की मौत, वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या और 1991 में राजीव गांधी की हत्या शामिल है।

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