विशेष : शुक्र के दिन हस्त नक्षत्र का संयोग, वृषभ लग्न में होगी धनतेरस की पूजा - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 4 नवंबर 2026

विशेष : शुक्र के दिन हस्त नक्षत्र का संयोग, वृषभ लग्न में होगी धनतेरस की पूजा

धनतेरस का पर्व कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान इसी दिन भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे. उन्हें देवताओं का वैद्य माना जाता है. इसलिए इस दिन आरोग्य और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के साथ भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है. धनतेरस को भगवान कुबेर की पूजा के लिए भी खास माना गया है. कुबेर को धन और संपन्नता का देवता माना जाता है. इस दिन उनकी पूजा करने से सुख-समृद्धि की कामना की जाती है. मान्यता है कि धनतेरस पर पूजा और खरीदारी करने से आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं. इसी वजह से इस दिन सोना, चांदी और नए बर्तन खरीदने की परंपरा चली आ रही है. छह नवंबर को धनत्रयोदशी का पर्व मनेगा, शाम 5:44 से 7:42 बजे तक लक्ष्मी-कुबेर पूजन का विशेष मुहूर्त है; कन्या राशि में चंद्रमा और तुला में सूर्य का संचरण, खरीदारी के लिए भी मिलेंगे शुभ अवसर


Dhanteras
दीपावली के पांच दिवसीय महापर्व का शुभारंभ इस बार छह नवंबर, शुक्रवार को धनतेरस के साथ होगा। कार्तिक कृष्ण पक्ष की धनत्रयोदशी का यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ ज्योतिषीय दृष्टि से भी विशेष संयोग लेकर आ रहा है। शुक्रवार का दिन, हस्त नक्षत्र, कन्या राशि में चंद्रमा और तुला राशि में सूर्य की स्थिति इस दिन के पंचांग को विशिष्ट बना रही है। शाम को प्रदोष काल में स्थिर वृषभ लग्न की उपलब्धता लक्ष्मी-कुबेर पूजन के लिए विशेष मानी गई है। यही वजह है कि इस बार धनतेरस पर खरीदारी के साथ संध्याकालीन पूजा का भी विशेष महत्व रहेगा। धनतेरस को धनत्रयोदशी और धन्वंतरि त्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान इसी दिन भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्हें आयुर्वेद और आरोग्य का अधिष्ठाता माना जाता है। इसलिए इस दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा के साथ भगवान कुबेर और मां लक्ष्मी का पूजन किया जाता है। सोना, चांदी, बर्तन और नई वस्तुओं की खरीदारी को भी शुभ माना जाता है।


काशी में धनतेरस केवल धन और वैभव की कामना का पर्व नहीं, बल्कि उस दिव्य परंपरा का उत्सव है, जहां स्वयं देवाधिदेव महादेव अन्न की याचना करते हैं और जगतजननी मां अन्नपूर्णा अन्नपूर्णेश्वरी बनकर समूची सृष्टि का भरण-पोषण करती हैं। इस बार मां के स्वर्णमयी स्वरूप के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का एक साल का इंतजार छह नवंबर को समाप्त होगा। धनतेरस से अन्नकूट तक पांच दिनों के लिए मां अन्नपूर्णा का स्वर्णमयी दरबार भक्तों के लिए खुलेगा। इस बार मां के खजाने में एक और अनूठा अध्याय जुड़ने जा रहा है। पहली बार 21 किलो चांदी से तैयार सिक्के भी खजाने में शामिल किए गए हैं। मां के पूजित खजाने से 10 लाख सिक्के और 10 बोरी से अधिक धान का लावा श्रद्धालुओं में वितरित किया जाएगा। धनतेरस की भोर में विधिवत पूजन के बाद स्वर्णमयी स्वरूप के कपाट खुलेंगे। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु दस नवंबर को शयन आरती तक मां के दिव्य दर्शन कर सकेंगे। पांच दिनों तक काशी की गलियां मां के जयकारों, घंटों की ध्वनि और श्रद्धालुओं की आस्था से गुंजायमान रहेंगी। मान्यता है कि मां के खजाने से प्राप्त सिक्के और धान का लावा घर की तिजोरी और अन्न भंडार में रखने से कभी अन्न-धन की कमी नहीं होती।


सुबह 10:30 बजे शुरू होगी त्रयोदशी तिथि

स्थानीय पंचांग के अनुसार, कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तिथि छह नवंबर को सुबह लगभग 10:30 बजे शुरू होगी और सात नवंबर को सुबह 10:47-10:48 बजे तक रहेगी। चूंकि छह नवंबर को त्रयोदशी तिथि प्रदोष काल में विद्यमान रहेगी, इसलिए इसी दिन धनतेरस का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन सूर्योदय सुबह लगभग 6:09 बजे और सूर्यास्त शाम 5:14 बजे होगा। शुक्रवार होने के कारण दिन के स्वामी शुक्र माने गए हैं। ज्योतिषीय मान्यता में शुक्र को सुख, वैभव, भौतिक संपन्नता, सौंदर्य और ऐश्वर्य का कारक ग्रह माना जाता है।


हस्त नक्षत्र और विष्कम्भ योग का संयोग

धनतेरस के दिन हस्त नक्षत्र रहेगा, जो सात नवंबर की सुबह लगभग 4:43 बजे तक प्रभावी रहेगा। इसके बाद चित्रा नक्षत्र प्रारंभ होगा। हस्त नक्षत्र का स्वामी चंद्रमा है और इसकी अधिष्ठात्री देवी सविता मानी जाती हैं। ज्योतिषीय मान्यता में हस्त नक्षत्र को कौशल, कर्म, निर्माण, व्यापार और हस्तगत उपलब्धियों से जोड़कर देखा जाता है। इस दिन विष्कम्भ योग भी रहेगा, जो सात नवंबर की सुबह लगभग 4:10 बजे तक प्रभावी होगा। इसके बाद प्रीति योग प्रारंभ होगा। पंचांग के पांच अंगों में योग का विशेष स्थान है। तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण के संयुक्त विचार से किसी दिन की शुभता का आकलन किया जाता है। करण की बात करें तो सुबह लगभग 10:30 बजे तक तैतिल करण रहेगा। इसके बाद गर करण प्रारंभ होगा, जो रात लगभग 10:36-10:37 बजे तक रहेगा। इसके बाद वणिज करण लगेगा।


ग्रहों की स्थिति भी बनाएगी विशेष ज्योतिषीय परिदृश्य

छह नवंबर की निरयन ग्रह स्थिति के अनुसार सूर्य तुला राशि में, चंद्रमा कन्या राशि में, मंगल कर्क राशि में, बुध तुला राशि में वक्री, गुरु सिंह राशि में, शुक्र कन्या राशि में वक्री तथा शनि मीन राशि में वक्री रहेंगे। राहु कुंभ और केतु सिंह राशि में स्थित होंगे। ज्योतिषीय दृष्टि से इस दिन सूर्य का तुला राशि में होना, चंद्रमा का कन्या में संचरण और शुक्र का कन्या राशि में वक्री होना विशेष चर्चा का विषय रहेगा। शुक्र को धन-वैभव और भौतिक सुखों का कारक माना जाता है, जबकि चंद्रमा मन, भावनाओं और मानसिक स्थिरता का प्रतिनिधित्व करता है। हालांकि ग्रहों की इन स्थितियों को शुभ-अशुभ फल के रूप में देखने के लिए व्यक्तिगत कुंडली और अन्य ज्योतिषीय गणनाओं का भी विचार किया जाता है।


शाम 5:44 से 7:42 बजे तक विशेष पूजा मुहूर्त

धनतेरस पर मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा के लिए प्रदोष काल को विशेष महत्व दिया गया है। वाराणसी के लिए उपलब्ध द्रिक पंचांग गणना के अनुसार, छह नवंबर को शाम 5:14 बजे से प्रदोष काल शुरू होगा। इस दौरान वृषभ लग्न शाम 5:44 बजे से 7:42 बजे तक रहेगा। वृषभ को स्थिर लग्न माना जाता है। धार्मिक-ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार, स्थिर लग्न में लक्ष्मी पूजन करने से घर में धन-धान्य और समृद्धि स्थायी रहने की कामना की जाती है। इसीलिए शाम 5:44 से 7:42 बजे तक का समय धनतेरस पूजन के लिए विशेष माना गया है। इस दौरान भगवान धन्वंतरि, मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर की विधिवत पूजा-अर्चना की जा सकती है। पूजा में दीप, धूप, पुष्प, नैवेद्य और मिठाई अर्पित करने के साथ परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना की जाती है।


खरीदारी के लिए भी शुभ समय

धनतेरस पर सोना-चांदी, आभूषण, बर्तन और घरेलू उपयोग की वस्तुएं खरीदने की परंपरा है। स्थानीय सूर्योदय के आधार पर उपलब्ध चौघड़िया गणना में खरीदारी के लिए प्रमुख समय इस प्रकार हैं— लाभ चौघड़िया: सुबह 7:32 से 8:55 बजे तक। अमृत चौघड़िया: सुबह 8:55 से 10:18 बजे तक। शुभ चौघड़िया: सुबह 11:41 बजे से दोपहर 1:04 बजे तक। राहुकाल सुबह 10:18 से 11:41 बजे तक रहेगा। परंपरागत ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार इस अवधि में शुभ कार्यों का आरंभ टालने की सलाह दी जाती है। अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:19 से दोपहर 12:03 बजे तक बताया गया है, लेकिन इसका कुछ समय राहुकाल से भी मेल खाता है। इसलिए खरीदारी के लिए इसे बिना विचार किए स्वतंत्र शुभ मुहूर्त नहीं मानना चाहिए।


धनतेरस पर यमदीपदान का भी विधान

धनतेरस की शाम यमदीपदान की परंपरा भी निभाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर भगवान यमराज से परिवार की सुख-समृद्धि और अकाल मृत्यु से रक्षा की प्रार्थना की जाती है। इसे यमराज के प्रति श्रद्धा और जीवन की रक्षा की कामना का प्रतीक माना गया है।


आरोग्य, धन और समृद्धि का पर्व

धनतेरस की विशेषता यही है कि यह केवल धन-संपत्ति की कामना का पर्व नहीं, बल्कि अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु और पारिवारिक मंगल का भी संदेश देता है। भगवान धन्वंतरि आरोग्य के प्रतीक हैं, भगवान कुबेर धन के संरक्षक और मां लक्ष्मी ऐश्वर्य एवं समृद्धि की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। काशी में इस पर्व का एक अलग आध्यात्मिक आयाम भी है। यहां बाबा विश्वनाथ के सम्मुख मां अन्नपूर्णा की आराधना और स्वर्णमयी दर्शन की परंपरा धनतेरस को विशिष्ट बनाती है। इस प्रकार यह पर्व अन्न, आरोग्य, धन और अध्यात्म के समन्वय का संदेश देता है। धनतेरस का वास्तविक अर्थ भी यही है कि समृद्धि केवल तिजोरी में रखे स्वर्ण-रजत से नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर, संतुष्ट मन, अन्न से भरी थाली और दूसरों के प्रति सेवा-भाव से आती है।




Suresh-gandhi


सुरेश गांधी

वरिष्ठ पत्रकार 

वाराणसी

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