- आतिशबाजी से रात के सीने पर उकेरी रोशनी की इबारत, हर देहरी पर लक्ष्मी का स्वागत, आसमान में रंगों का विस्फोट
- घाटों पर उमड़ा जनसैलाब; विदेशी पर्यटकों ने कैमरों में कैद की काशी की अलौकिक छटा
- 20 फीसदी महंगे पटाखे भी नहीं रोक पाए उत्साह, पटाखों की गूंज और जयकारों से देर रात तक गूंजती रही काशी अमावस्या की कालिमा को लाखों दीपों ने दी चुनौती
बाबा के दरबार में राष्ट्र कल्याण की कामना, महालक्ष्मी की विशेष आराधना
श्री काशी विश्वनाथ धाम में दीपावली का आध्यात्मिक वैभव देखते ही बना। सांझ ढलते ही धाम का प्रांगण दीपों की मृदुल ज्योति से आलोकित हो उठा। सत्यनारायण मंदिर में महालक्ष्मी और गणपति की षोडशोपचार पूजा के साथ विशेष पूजन-अर्चन किया गया। मुख्य कार्यपालक अधिकारी विश्वभूषण मिश्र ने सपरिवार शास्त्रीय विधि-विधान से महालक्ष्मी पूजन किया। इस दौरान राष्ट्र, समाज और संपूर्ण विश्व के कल्याण की कामना की गई। धाम की भव्य सजावट और दीपों की आभा ने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति से भर दिया। बाबा विश्वनाथ के दरबार से लेकर मां अन्नपूर्णा के आंगन तक श्रद्धा और समृद्धि की मंगलकामना का स्वर गूंजता रहा।
गंगा की लहरों पर उतरा सितारों का संसार, घाटों पर आस्था का सैलाब
काशी के घाटों पर दीपावली का दृश्य अपने आप में अनुपम रहा। दशाश्वमेध से लेकर आसपास के गंगा तटों तक दीपों की कतारें दूर तक चमकती रहीं। गंगा पार रेती पर श्रद्धालुओं ने दीप जलाकर प्रकाश की अनंत शृंखला बना दी। जलती हुई बातियों की परछाइयां जब गंगा की लहरों पर थिरकतीं तो लगता मानो आकाश के सितारे धरती पर उतर आए हों। घाटों पर उमड़ी भीड़ के बीच हर-हर महादेव और जय मां गंगे के जयघोष वातावरण को भक्तिमय बनाते रहे। विदेशी पर्यटक भी इस अलौकिक दृश्य के आकर्षण से अछूते नहीं रहे। कोई कैमरे में घाटों की रोशनी कैद करता दिखा तो कोई गंगा की लहरों के बीच दीपों की छटा निहारता रहा। युवाओं ने मोबाइल और ड्रोन कैमरों से काशी के इस अद्भुत रूप को सहेजा। सोशल मीडिया पर भी रोशनी से नहाई काशी की तस्वीरें और वीडियो छाए रहे।
20 फीसदी महंगे पटाखे, फिर भी खरीदारी में कमी नहीं; नए डिजाइन बने आकर्षण
दीपावली की रात आतिशबाजी ने उत्सव को चरम पर पहुंचा दिया। बाजारों में इस बार मोर पंख, झूमर ड्रोन, बटरफ्लाई और चुनमुन अनार जैसे नए डिजाइन के पटाखों ने खास आकर्षित किया। कीमतों में करीब 20 प्रतिशत तक वृद्धि के बावजूद लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ। बच्चों ने फुलझड़ियों और अनार से खुशियां बटोरीं तो युवाओं ने रंगीन आतिशबाजी के जरिए आसमान को रोशन किया। मिठाई की दुकानों पर भी दिनभर खरीदारों की आवाजाही बनी रही। देर शाम तक मिठाइयों, पूजन सामग्री और उपहारों की खरीदारी होती रही। लोगों ने एक-दूसरे का मुंह मीठा कराकर दीपावली की शुभकामनाएं दीं।
बही-खातों से कंप्यूटर तक लक्ष्मी का आह्वान, नए कारोबारी साल की शुरुआत
दीपावली व्यापारिक नववर्ष का भी प्रतीक है। इस अवसर पर सिगरा, लहुराबीर, गोदौलिया, मदनपुरा और लंका समेत प्रमुख बाजारों में व्यापारियों ने परंपरागत बही-खातों, कलम, दवात और गणेश-लक्ष्मी-कुबेर का विधिवत पूजन किया। बदलते समय के साथ पूजा की परंपरा में आधुनिक तकनीक भी शामिल हो गई। दुकानदारों और कारोबारियों ने कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल और डिजिटल उपकरणों का पूजन कर नए कारोबारी सत्र का शुभारंभ किया। मान्यता है कि दीपावली पर बही-खाता पूजन से कारोबार में बरकत और वर्षभर आर्थिक समृद्धि बनी रहती है।
हर देहरी पर दीप, हर चेहरे पर मुस्कान; सूने घर भी नहीं रहे अंधेरे
काशी की दीपावली का एक भावनात्मक पक्ष भी दिखाई दिया। लोगों ने अपने घरों के साथ आसपास के सूने और बंद पड़े मकानों के बाहर भी दीप जलाए, ताकि अमावस्या की रात कोई कोना अंधेरे में न रहे। घरों में महिलाओं ने आरती की थाल सजाकर मां लक्ष्मी का स्वागत किया। बच्चों की टोलियां आतिशबाजी में मग्न रहीं तो बड़े एक-दूसरे को बधाइयां देने और मिठाइयां बांटने में जुटे रहे। ग्रामीण अंचलों से लेकर शहर के मोहल्लों तक सजावट और रोशनी का उत्साह दिखाई दिया। भीड़ को देखते हुए यातायात पुलिस ने प्रमुख चौराहों और मार्गों पर चौकसी बरती।
दीपों का पर्व, भीतर के अंधकार से लड़ने का संदेश
काशी की दीपावली केवल रोशनी, मिठाई और आतिशबाजी का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का भी स्मरण कराती है। सनातन परंपरा में प्रकाश को ज्ञान, चेतना और सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' अर्थात हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो—यह प्रार्थना इस पर्व की आत्मा है। शिवपुराण में वर्णित ज्योतिर्लिंग की अनंत ज्योति की स्मृति से जुड़ी काशी में दीपों का यह उत्सव विशेष आध्यात्मिक अर्थ ग्रहण कर लेता है। यहां हर दीप मानो यही कहता है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा हो, प्रकाश की एक छोटी-सी लौ भी उसे चुनौती दे सकती है। रात गहराती रही, लेकिन काशी का उजास कम नहीं हुआ। गंगा की लहरों पर झिलमिलाते दीप, मंदिरों में गूंजते मंत्र, आसमान में रंग बिखेरती आतिशबाजी और घरों में गूंजती मंगलकामनाएं इस बात की साक्षी बनीं कि काशी के लिए दीपावली महज एक तिथि नहीं, आस्था, परंपरा और जीवन की उजली उम्मीदों का महापर्व है।

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