- पूर्व सांसद और दो बार के स्नातक एमएलसी डॉ. राजेश मिश्रा ने खोली तैयारी की परतें, बोले—सालभर पहले से सभी जिलों में बनाने पड़ते हैं वोट; मजबूत कार्यकर्ताओं का चयन भी जरूरी
- भाजपा ने चुनाव लड़ने को कहा था, मैंने मना कर दिया; अब जब भी चुनाव लड़ूंगा, सांसद का ही लड़ूंगा
भाजपा ने कहा था चुनाव लड़िए, मैंने मना कर दिया
डॉ. राजेश मिश्रा के मुताबिक, भाजपा की ओर से उनसे एमएलसी चुनाव लड़ने के लिए कहा गया था, लेकिन उन्होंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब जब भी चुनाव लड़ेंगे, सांसद का ही चुनाव लड़ेंगे। पार्टी उन्हें कहां और किस भूमिका में समायोजित करती है, यह भाजपा नेतृत्व का विषय है। उनका यह बयान प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया के बीच एक महत्वपूर्ण संदर्भ जोड़ता है। हालांकि, उनके इनकार को भाजपा की हार का कारण नहीं माना जा सकता, लेकिन इससे यह सवाल जरूर उठता है कि क्या पार्टी ने संभावित उम्मीदवारों और चुनावी तैयारी पर पर्याप्त समय रहते विचार किया था? क्या प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया पहले पूरी हो जाती तो मतदाता संपर्क और संगठनात्मक सक्रियता को अधिक समय मिल पाता? डॉ. मिश्रा का जोर इसी समयबद्ध तैयारी पर है। उनके अनुसार, स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का विस्तार कई जिलों तक है। यहां चुनाव केवल किसी एक शहर, विधानसभा या स्थानीय संगठन के भरोसे नहीं लड़ा जा सकता। प्रत्येक जिले में मतदाताओं का नेटवर्क तैयार करना, उनसे लगातार संपर्क बनाए रखना और भरोसेमंद कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देना पड़ता है। चुनाव के अंतिम एक-दो महीने में सक्रियता बढ़ाने से उस लंबे संपर्क की भरपाई नहीं हो सकती, जो पहले से बनना चाहिए था।
आठ जिलों में फैला चुनाव, तैयारी कितनी लंबी?
वाराणसी खंड स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में वाराणसी के अलावा चंदौली, गाजीपुर, जौनपुर, बलिया, भदोही, मिर्जापुर और सोनभद्र शामिल हैं। यानी चुनावी क्षेत्र का विस्तार आठ जिलों तक है। ऐसे में प्रत्याशी को मतदाताओं तक पहुंचने के लिए केवल सभाओं और बड़े नेताओं के कार्यक्रमों पर निर्भर नहीं रहना होता। व्यक्तिगत संपर्क, शिक्षक-स्नातक समूहों से संवाद, मतदाता सूची का पुनरीक्षण और मतदान प्रक्रिया की जानकारी—ये सभी चुनावी तैयारी के जरूरी हिस्से हैं। मेरे द्वारा पूर्व मे की गई चुनावी समीक्षा में भी प्रत्याशी चयन में देरी और सपा की पहले से शुरू हुई तैयारी को भाजपा के सामने चुनौती के रूप में रेखांकित किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, सपा ने अपने दोनों मौजूदा एमएलसी को करीब डेढ़ साल पहले ही दोबारा प्रत्याशी घोषित कर दिया था, जबकि भाजपा ने अपने उम्मीदवारों के नाम 29 सितंबर को घोषित किए। इस अंतर ने प्रचार और मतदाता संपर्क के लिए उपलब्ध समय को प्रभावित किया। यहां डॉ. राजेश मिश्रा का अनुभव एक बुनियादी सवाल सामने रखता है—क्या पार्टी ने इस चुनाव की विशिष्ट प्रकृति को समझते हुए सालभर पहले से तैयारी की थी? यदि मतदाता सूची में नाम जुड़वाना ही जीत की पहली शर्त है, तो इस काम की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय थी? और जिन जिलों में पार्टी का संगठन मजबूत माना जाता है, वहां मतदाता संपर्क का वास्तविक हिसाब क्या रहा?
मतदाता बढ़े, लेकिन जीत का अंतर भी बढ़ा
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के आंकड़े भी समीक्षा की जरूरत बताते हैं। वर्ष 2020 में यहां 2,09,754 मतदाता पंजीकृत थे, जबकि 2026 में यह संख्या बढ़कर 2,88,553 हो गई। यानी लगभग छह वर्षों में 78,799 मतदाता बढ़े। इस बार 1,18,611 मतदाताओं ने मतदान किया, जबकि 2020 में 82,498 मत पड़े थे। मतदान प्रतिशत भी 39.33 से बढ़कर 41.11 हो गया। वर्ष 2020 में सपा के आशुतोष सिन्हा ने भाजपा के केदारनाथ सिंह को 3,650 मतों से हराया था। इस बार अंतिम परिणाम के अनुसार आशुतोष सिन्हा को 55,046 और केदार सिंह को 35,114 मत मिले। इस तरह जीत का अंतर बढ़कर 19,932 मत हो गया। यानी मतदाता आधार बढ़ने और मतदान में वृद्धि के बावजूद भाजपा पिछली बार की तुलना में अधिक बड़े अंतर से पीछे रह गई। इन आंकड़ों से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि नए मतदाता किसी एक दल के पक्ष में ही थे। लेकिन इतना स्पष्ट है कि मतदाता सूची का विस्तार भाजपा को अपेक्षित चुनावी लाभ नहीं दिला सका। ऐसे में मतदाता बनाने के अभियान की संख्या के साथ उसकी गुणवत्ता, क्षेत्रवार सक्रियता और मतदान के दिन तक संपर्क बनाए रखने की समीक्षा जरूरी है।
बड़ी फौज, फिर भी नतीजों में क्यों नहीं दिखी ताकत?
नतीजों के बाद राजनीतिक गलियारों में एक चुटकी भी खूब सुनाई दे रही है—जिस संगठन की इतनी बड़ी फौज है, उसका यह हश्र कैसे हो गया? यह तंज केवल विरोधी खेमे तक सीमित नहीं है। संगठन के भीतर भी चुनावी सक्रियता, जिम्मेदारी और संवाद को लेकर चर्चा हो रही है। नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर बातचीत करने वाले कुछ संगठनात्मक सूत्रों के मुताबिक, चुनाव के बाद विभिन्न स्तरों पर जुड़े लोगों के बीच निष्पक्ष समीक्षा की अपेक्षा है। चिंता यह है कि क्या जमीनी कार्यकर्ताओं की बात नेतृत्व तक उसी रूप में पहुंचती है, जैसी वे महसूस करते हैं? क्या बैठकों में दिखाई देने वाली सक्रियता मतदाताओं के बीच भी उतनी ही प्रभावी रही? क्या पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की भूमिका को पर्याप्त महत्व मिला? इन चर्चाओं को किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ आरोप के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह संगठन की कार्यशैली और चुनावी प्रबंधन को परखने के बिंदु हैं। भाजपा के सामने चुनौती यह भी है कि वह आत्मविश्वास और अति-आत्मविश्वास के बीच अंतर पहचाने। बड़ी संगठनात्मक संरचना तभी चुनावी ताकत बनती है, जब उसके कार्यकर्ता सक्रिय हों, उनकी जिम्मेदारी स्पष्ट हो और उनकी प्रतिक्रिया को निर्णय प्रक्रिया में जगह मिले।
शिक्षक सीट पर भी सपा का कब्जा बरकरार
स्नातक सीट के साथ शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भी सपा के लाल बिहारी यादव ने जीत दर्ज कर अपना कब्जा बरकरार रखा। उन्होंने भाजपा के डॉ. प्रमोद मिश्रा को 5,015 मतों से पराजित किया। इस तरह काशी की दोनों विधान परिषद सीटों पर सपा की सफलता ने भाजपा के लिए समीक्षा का दायरा और बढ़ा दिया है। प्रदेश की 11 शिक्षक-स्नातक सीटों में भाजपा ने छह और सपा ने पांच सीटें जीतीं। दोनों सीटों के मतदाता वर्ग अलग हैं, इसलिए इनके नतीजों के कारण भी अलग-अलग हो सकते हैं। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में शिक्षक संगठनों और व्यक्तिगत संपर्क की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, जबकि स्नातक सीट पर आठ जिलों में फैले व्यापक मतदाता नेटवर्क की जरूरत पड़ती है। फिर भी दोनों जगह सपा की जीत भाजपा के लिए एक साझा सवाल छोड़ती है—क्या संगठन की चुनावी तैयारी मतदाता वर्ग की जरूरतों के अनुरूप थी?
2027 से पहले समीक्षा का अवसर
विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक चुनाव को सीधे विधानसभा चुनाव का पूर्वानुमान मानना उचित नहीं होगा। दोनों चुनावों का मतदाता वर्ग, मुद्दे और स्थानीय समीकरण अलग होते हैं। लेकिन ये परिणाम संगठन की जमीनी सक्रियता, संपर्क व्यवस्था और स्थानीय नेतृत्व के समन्वय को परखने का अवसर जरूर देते हैं। इसलिए भाजपा के लिए जरूरी है कि वह हार का ठीकरा किसी प्रत्याशी, पदाधिकारी या कार्यकर्ता पर फोड़ने के बजाय पूरी प्रक्रिया की समीक्षा करे। प्रत्याशी चयन कब हुआ, मतदाता सूची के पुनरीक्षण में किस स्तर पर कितनी सक्रियता रही, आठ जिलों में जिम्मेदारी कैसे बांटी गई, मतदाताओं से कितनी बार संपर्क हुआ और मतदान के दिन पार्टी का नेटवर्क कितना प्रभावी रहा—इन सभी सवालों का तथ्यपरक जवाब तलाशना होगा। डॉ. राजेश मिश्रा का अनुभव इसी समीक्षा में एक महत्वपूर्ण बात जोड़ता है—एमएलसी चुनाव केवल चुनाव के दिनों में नहीं लड़ा जाता, उसकी जमीन बहुत पहले तैयार करनी पड़ती है। बड़ी फौज होना संगठन की ताकत हो सकती है, लेकिन उस ताकत का परिणाम में बदलना निरंतर तैयारी, सही समय पर निर्णय और मतदाता से सीधे संवाद पर निर्भर करता है। काशी के नतीजों ने भाजपा के सामने यही कसौटी रखी है। अब देखना यह है कि पार्टी इसे महज दो सीटों की हार मानती है या उस चुनावी तैयारी की पड़ताल करती है, जिसकी शुरुआत मतदान की तारीख घोषित होने से बहुत पहले हो जानी चाहिए थी।
बीएचयू छात्र राजनीति से संसद और फिर भाजपा तक
वर्ष/अवधि राजनीतिक पड़ाव
1980 काशी हिंदू विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से सार्वजनिक जीवन की शुरुआत; छात्रसंघ अध्यक्ष भी रहे।
1986 वाराणसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विधान परिषद सदस्य निर्वाचित।
1987 एमएलसी चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस में शामिल हुए।
1996–2004 वाराणसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद के दो कार्यकाल पूरे किए।
1999 कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में वाराणसी लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता नहीं मिली।
2004 वाराणसी लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर भाजपा के शंकर प्रसाद जायसवाल को हराकर सांसद बने।
2009 कांग्रेस ने दोबारा टिकट दिया, लेकिन वाराणसी से चुनाव हार गए।
2017 कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में वाराणसी दक्षिण विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, पराजित हुए।
2022 कांग्रेस के टिकट पर वाराणसी कैंट विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, जीत नहीं मिली।
मार्च 2024 कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए।
राजनीतिक पहचान: बीएचयू छात्र राजनीति से निकले नेता, दो बार विधान परिषद सदस्य और 2004 में वाराणसी से सांसद। कांग्रेस में प्रदेश उपाध्यक्ष सहित कई संगठनात्मक जिम्मेदारियां भी निभाईं।

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