छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट ने मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ.बिनायक सेन की जमानत याचिका खारिज कर दिया है। इनकी जमानत याचिका का राज्य सरकार ने माओवादियों से संबंध रखने के आधार पर विरोध किया। जस्टिस टीपी शर्मा, आरएल झंवर की डिवीजन बेंच में राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता किशोर भादुड़ी ने कई तर्क दिए। उन्होंने कहा कि बिनायक सेन खुद को बच्चों का डॉक्टर बताते हैं, लेकिन इलाज संबंधी उनका कोई रिकॉर्ड नहीं है।
पीजूष गुहा के पास ऐसा कोई दस्तावेजी सबूत नहीं मिला, जिससे उसे तेंदूपत्ता व्यवसायी माना जाए। जो पत्र और दस्तावेज बरामद हुए, उससे यह साबित होता है कि दोनों के संबंध नक्सलियों से हैं और वे देशद्रोही गतिविधियों में लिप्त थे। डॉ. सेन खुद को डाक्टर बताते हैं लेकिन उनके यहां छानबीन में दवा, इलाज संबंधी उपकरण सहित डाक्टरी करने के एक भी प्रमाण सामने नहीं आए। बरामद साहित्य, दस्तावेज, कंप्यूटर के रिकार्ड से पता चलता है कि उनके संबंध माओवादियों से हैं।
माओवादियों से मिले दस्तावेजों में भी इन तीनों के साथ ही बिनायक की पत्नी इलीना का भी उल्लेख मिला है। अगर ये लोग सामाजिक संस्था से जुड़ें हैं तो नक्सलियों के पास इनका नाम और रिकार्ड कैसे आया?

1 टिप्पणी:
ab kahira ki tarah yaha bhi kranti ki jaroorat hai. fascism ka chehr samne hai . har padha likha aadmi jail me hoga , shame .....2....2...
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