काशी ने अनेक राजवंशों का उत्थान-पतन देखा है, पर इस बार गंगा किनारे गूंजे मंत्रों के बीच राजनीति की एक नई ध्वनि भी सुनाई दी। संत रविदास के 650वें प्रकाश पर्व पर सीर गोवर्धनपुर में सजा मंच केवल श्रद्धा, भक्ति और परंपरा का उत्सव नहीं था; वह उत्तर भारत की बदलती सामाजिक संरचना का सार्वजनिक पाठ भी था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में संत रविदास, महर्षि वाल्मीकि, निषादराज और माता शबरी जैसे प्रतीकों को जिस क्रम और आग्रह के साथ सामने रखा, उसने यह संकेत दिया कि भाजपा अब सांस्कृतिक स्मृतियों के माध्यम से नए सामाजिक गठबंधन गढ़ने की कोशिश कर रही है। काशी से पंजाब तक संत परंपरा की कड़ी जोड़ना, रविदासिया समाज का विशेष उल्लेख करना और समरसता अभियान को 2027 तक ले जाने की घोषणा राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह वही समय है जब उत्तर प्रदेश और पंजाब दोनों राज्यों में चुनावी तैयारियां निर्णायक चरण में प्रवेश करेंगी। इसलिए यह आयोजन धार्मिक आस्था से कहीं अधिक व्यापक अर्थ ग्रहण करता है। इसमें दलित सम्मान, ओबीसी प्रतिनिधित्व, सांस्कृतिक पहचान, कल्याणकारी राजनीति और चुनावी गणित—सभी एक साथ उपस्थित दिखाई देते हैं। प्रश्न अब केवल यह नहीं है कि संत रविदास का सम्मान कैसे हो; प्रश्न यह भी है कि क्या सांस्कृतिक प्रतीकों के सहारे सामाजिक न्याय की नई राजनीति गढ़ी जा सकती है और क्या काशी से उठा यह संदेश पूरे उत्तर भारत की राजनीति का नया सूत्र बन पाएगा।
संतों का मंच और चुनावी गणित
इस पूरे आयोजन का राजनीतिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण था। सीर गोवर्धनपुर के मंच पर धार्मिक संतों के साथ बड़ी संख्या में ओबीसी और दलित नेतृत्व की उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि भाजपा सामाजिक प्रतिनिधित्व का नया दृश्य निर्मित करना चाहती है। मंच पर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड और दिल्ली से आए अनेक नेता मौजूद थे। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यंत गौतम, मंत्री असीम अरुण, हंसराज विश्वकर्मा, संजीव गौड़, क्षेत्रीय अध्यक्ष अशोक चौरसिया सहित कई प्रमुख चेहरे ओबीसी और दलित समाज से आते हैं। यह उपस्थिति केवल औपचारिक नहीं थी; यह सामाजिक विस्तार की दृश्य राजनीति थी। करीब सात महीने तक चलने वाले इस अभियान का समापन फरवरी 2027 में प्रस्तावित है। राजनीतिक दृष्टि से यह समय अत्यंत महत्वपूर्ण है। पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होंगी और उत्तर प्रदेश में भी आगामी विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि बनने लगेगी। ऐसे समय में काशी से शुरू हुआ यह अभियान भाजपा को दलित और अति पिछड़े समुदायों के बीच नए संवाद का अवसर देता है। लगभग हर वक्ता ने संत रविदास के समता, सामाजिक न्याय और जाति-विहीन समाज के संदेश को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजनाओं और भाजपा सरकार की नीतियों से जोड़ने का प्रयास किया। पंजाब इस रणनीति का विशेष केंद्र है। डोआबा क्षेत्र में रविदासिया समाज का व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव है और कई विधानसभा क्षेत्रों में उसकी भूमिका निर्णायक मानी जाती है। सीर गोवर्धनपुर स्थित संत रविदास जन्मस्थली का भावनात्मक संबंध पंजाब के लाखों अनुयायियों से जुड़ा है। काशी से मिट्टी भेजने और विशेष रेल सेवाओं जैसी घोषणाओं ने उत्तर प्रदेश और पंजाब के बीच साझा सांस्कृतिक-सामाजिक सेतु का संदेश दिया है। काशी का यह आयोजन अंततः भाजपा की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है जिसमें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, कल्याणकारी राजनीति और बहुजन प्रतीकों को एक साझा राजनीतिक आख्यान में पिरोया जा रहा है। योगी आदित्यनाथ का भाषण इस नई राजनीति का घोषणापत्र जैसा था, जहां संत परंपरा केवल आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक विस्तार का माध्यम बनती दिखाई देती है। आने वाले चुनाव तय करेंगे कि काशी से निकला यह समरसता सूत्र उत्तर प्रदेश की सीमाओं से आगे बढ़कर पूरे उत्तर भारत के सामाजिक मानस में कितनी गहराई तक उतर पाता है।
समरसता से स्टार्टअप तक : क्या बदल रहा है उत्तर प्रदेश का विकास विमर्श?
काशी के समरसता अभियान के समानांतर उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक दूसरा चेहरा भी तेजी से उभर रहा है—आर्थिक पुनर्निर्माण और प्रतिभा की वापसी का। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार यह संदेश दे रहे हैं कि उत्तर प्रदेश केवल धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रदेश नहीं, बल्कि निवेश, नवाचार और उद्यमिता का नया केंद्र बनना चाहता है। सरकार का दावा है कि राज्य में 21 हजार से अधिक स्टार्टअप सक्रिय हैं और अनेक यूनिकॉर्न तथा उच्च-विकास वाली कंपनियों का पारिस्थितिकी तंत्र तैयार हो चुका है। यदि यह परिवर्तन स्थायी रूप लेता है तो उत्तर प्रदेश रोजगार मांगने वाले राज्य से रोजगार पैदा करने वाले राज्य में बदल सकता है। इस नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष महिला उद्यमिता है। महिला नेतृत्व वाले स्टार्टअप को अतिरिक्त अनुदान, सहायता केंद्रों में आरक्षित सीटें और प्रशिक्षण सुविधाएं देकर सरकार आर्थिक भागीदारी का दायरा बढ़ाना चाहती है। पूर्वांचल और अन्य अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्रों में स्टार्टअप प्रोत्साहन योजनाएं क्षेत्रीय असंतुलन कम करने की दिशा में भी देखी जा रही हैं। एक ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य अब केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि निवेश आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा का औजार बन चुका है। वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों के साथ संवाद और निवेश प्रक्रियाओं के सरलीकरण के प्रयास इसी रणनीति का हिस्सा हैं। सरकार यह भी कह रही है कि वह राज्य से बाहर गई प्रतिभा को वापस बुलाना चाहती है। यहीं इस पूरी बहस का सबसे दिलचस्प मोड़ है। एक ओर संत परंपरा के प्रतीकों के माध्यम से सामाजिक समरसता का संदेश दिया जा रहा है, दूसरी ओर स्टार्टअप और निवेश के माध्यम से आर्थिक अवसरों का नया आख्यान रचा जा रहा है। यदि सामाजिक सम्मान और आर्थिक अवसर दोनों साथ चलते हैं तो यह मॉडल व्यापक राजनीतिक स्वीकार्यता प्राप्त कर सकता है। लेकिन यदि सांस्कृतिक प्रतीकवाद आर्थिक वास्तविकताओं पर भारी पड़ता है, तो समरसता का संदेश सीमित प्रभाव तक सिमट सकता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति आज शायद इसी दोराहे पर खड़ी है—पहचान की राजनीति और अवसर की राजनीति के संगम पर। काशी का मंच इस नए प्रयोग का प्रतीक बन चुका है; अब देखना यह है कि यह प्रयोग चुनावी लाभ से आगे बढ़कर सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की स्थायी दिशा बन पाता है या नहीं।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी



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