सीहोर : सात दिवसीय संकल्प पीढ़ी संवाद में आज होगा मिट्टी से थाली तक कार्यक्रम - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 28 सितंबर 2026

सीहोर : सात दिवसीय संकल्प पीढ़ी संवाद में आज होगा मिट्टी से थाली तक कार्यक्रम

  • बुजुर्ग हमारे अतीत की जड़ें और भविष्य की नींव हैं, उनके अनुभव जीवन की अमूल्य धरोहर : पंडित सचिन त्रिवेदी

Sankalp-pidhi-samwad
सीहोर। बुजुर्गों का साथ हमें यह सिखाता है कि जीवन केवल दौड़ का नाम नहीं, बल्कि अनुभवों का लंबा सफर है। वे हमें धैर्य रखना, रिश्तों को निभाना और छोटी-छोटी खुशियों में जीवन का सुकून तलाशना सिखाते हैं। उनकी मौजूदगी घर को घर बनाती है और उनके अनुभव जीवन को सही दिशा देते हैं। हमें बुजुर्गों के साथ समय बिताना चाहिए, उनका सम्मान करना चाहिए और उनके अनुभवों से सीखना चाहिए। क्योंकि जिस दिन हम उनके अनुभवों का महत्व समझ जाएंगे, उसी दिन जीवन को सही मायनों में जीना सीख जाएंगे। बुजुर्ग हमारे अतीत की जड़ें हैं और हमारे भविष्य की नींव भी। उक्त विचार उज्जैन स्थित प्रसिद्ध शनि मंदिर के पुजारी पंडित सचिन त्रिवेदी ने सैकड़ाखेड़ी स्थित संकल्प वृद्धाश्रम में सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग तथा संकल्प वृद्धाश्रम के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय 'संकल्प पीढ़ी संवाद अनुभव से भविष्य की ओर कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए।


बुजुर्गों के साथ बच्चों ने खेला, सीखा और साझा किए अनुभव

सात दिवसीय कार्यक्रम के पांचवें दिन 'साथ खेलें, साथ सीखेंÓ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें बुजुर्गों और बच्चों के बीच आत्मीय संवाद के साथ विभिन्न गतिविधियां आयोजित की गईं। बच्चों ने बुजुर्गों के साथ कैरम सहित अन्य खेलों में सहभागिता की। इसके अलावा बच्चों ने कविता पाठ की प्रस्तुति देकर कार्यक्रम को जीवंत बनाया, इस अवसर पर पिपलेश्वर मंदिर समिति की ओर से ऋषिराज शर्मा, स्वर्णकार समाज की ओर से विपिन सोनी, पं. पवन व्यास, संस्कार मंच के सहायक प्रभारी धर्मेंद्र माहेश्वरी, सनातन सेना के आयुष गुप्ता तथा केन्द्र की ओर से अजय मीना, रीतेश माहेश्वरी, दीपक गौर सहित अन्य सदस्यों ने वृद्धाश्रम में निवासरत दो दर्जन से अधिक बुजुर्गों का सम्मान किया। कार्यक्रम के दौरान बच्चों और बुजुर्गों के बीच संवाद का वातावरण बना रहा। बच्चों ने बुजुर्गों के जीवन अनुभवों को सुना, वहीं बुजुर्गों ने भी बच्चों के साथ खेलते हुए अपनेपन और खुशी का अनुभव किया। आयोजन का उद्देश्य विभिन्न पीढ़ियों के बीच दूरी कम कर आपसी सम्मान, संवाद और आत्मीयता को बढ़ावा देना रहा।


विद्यालयों के बच्चे नियमित रूप से पहुंच रहे वृद्धाश्रम

कार्यक्रम के दौरान शहर के विभिन्न शासकीय एवं अशासकीय विद्यालयों के बच्चे भी नियमित रूप से वृद्धाश्रम पहुंच रहे हैं। बच्चे बुजुर्गों के साथ संवाद कर उनके अनुभवों और जीवन संघर्षों को समझने का प्रयास कर रहे हैं। इससे बच्चों को जीवन मूल्यों, संस्कारों और पारिवारिक रिश्तों की अहमियत समझने का अवसर मिल रहा है। केन्द्र के संचालक राहुल सिंह तथा श्रद्धा भक्ति सेवा समिति की ओर से मनोज दीक्षित 'मामाÓ ने बताया कि भारत सरकार एवं प्रदेश सरकार के मार्गदर्शन में सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग तथा संकल्प वृद्धाश्रम केन्द्र द्वारा यह सात दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम के माध्यम से वरिष्ठ नागरिकों, बच्चों और युवाओं को एक मंच पर लाकर अनुभवों के आदान-प्रदान का प्रयास किया जा रहा है।


आज 'मिट्टी से थाली तक कार्यक्रम

सात दिवसीय संकल्प पीढ़ी संवाद के तहत मंगलवार को 'मिट्टी से थाली तकÓ कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम में परंपरागत जीवनशैली, मिट्टी, खेती, भोजन और उससे जुड़े अनुभवों के माध्यम से नई पीढ़ी को हमारी पुरानी परंपराओं एवं जीवन मूल्यों से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। कार्यक्रम के दौरान दोपहर 12:30 बजे प्रसादी वितरण भी किया जाएगा।


सत्संग से मन के विकार दूर होते हैं : पंडित सुनील पाराशर

इस अवसर पर पं. सुनील पाराशर ने कहा कि सत्संग से मन के विकार दूर होते हैं और अच्छे एवं पवित्र विचार जागृत होते हैं। मनुष्य जिस प्रकार के विचारों और संगति को अपनाता है, उसका प्रभाव उसके जीवन पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि संसार के भौतिक सुखों का भोग करने वाला मनुष्य कई बार बंधन और दुख में उलझ जाता है, जबकि आत्मबोध की स्थिति को प्राप्त करने वाला व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है। उन्होंने समझाया कि जिस प्रकार सूत वस्त्र में मौजूद होता है, लेकिन स्वयं वस्त्र नहीं होता और सोना आभूषण में होते हुए भी केवल आभूषण नहीं बन जाता, उसी प्रकार मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप और कर्म के अंतर को समझना चाहिए। पं. पाराशर ने कहा कि जब व्यक्ति किसी गुण को अपने भीतर स्वीकार करता है तो उसके साथ कर्तृत्व का भाव भी जुड़ जाता है। कर्तृत्व और भोक्तृत्व के बंधन से मुक्त होने के लिए आत्मचिंतन और सत्संग आवश्यक है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से नई पीढ़ी को अनुभव, संस्कार और जीवन मूल्यों से जोड़ने का प्रयास समाज के लिए महत्वपूर्ण है।

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