दिल्ली : SC 'प्रधान न्यायाधीश-केंद्रित', पारदर्शी कॉलेजियम प्रक्रिया की जरूरत: न्यायमूर्ति ओका - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

दिल्ली : SC 'प्रधान न्यायाधीश-केंद्रित', पारदर्शी कॉलेजियम प्रक्रिया की जरूरत: न्यायमूर्ति ओका

justice-oka
नई दिल्ली।  उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.एस. ओका ने मंगलवार को कहा कि शीर्ष अदालत ‘‘प्रधान न्यायाधीश-केंद्रित’’ है, और मामलों को सूचीबद्ध करने में मानवीय हस्तक्षेप को रोकने के लिए एक उपयुक्त रोस्टर प्रणाली की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि कॉलेजियम प्रणाली को तब तक नहीं बदला जाना चाहिए, जब तक कि इसका कोई बेहतर विकल्प न मिल जाए। यहां 'कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स' द्वारा ‘‘उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की जवाबदेही’’ विषय पर आयोजित एक कार्यक्रम में, न्यायमूर्ति ओका ने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता किए बिना प्रत्येक स्तर पर न्यायिक जवाबदेही को मजबूत किया जाना चाहिए।उन्होंने कहा, ‘‘मैं कॉलेजियम प्रणाली में दृढ़ता से विश्वास करता हूं, क्योंकि मेरा मानना ​​है कि जब तक इसकी जगह कोई बेहतर प्रणाली नहीं लाई जाती है, तब तक हमें इसे नहीं हटाना चाहिए।’’ न्यायमूर्ति ओका ने कहा कि इसके कार्यान्वयन में हुई गलतियों का मतलब यह नहीं है कि यह प्रणाली ही खराब है। न्यायमूर्ति ओका ने इस बात पर जोर दिया कि उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर केवल प्रस्तावों को प्रकाशित कर देने से कॉलेजियम के कामकाज में पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं होती। उन्होंने कहा, ‘‘वेबसाइट पर विस्तृत प्रस्ताव प्रकाशित करने मात्र से कॉलेजियम के कामकाज में पारदर्शिता नहीं आ जाती। पारदर्शिता उस प्रक्रिया में होनी चाहिए जिसका पालन किया जाता है।’’ 


न्यायमूर्ति ओका ने सरकार की ओर से अधिक जवाबदेही की भी मांग की और इस बात की ओर इशारा किया कि कॉलेजियम की सिफारिशें अक्सर महीनों तक लंबित पड़ी रहती हैं। न्यायमूर्ति ओका ने कहा कि उच्चतम न्यायालय में भी उच्च न्यायालयों की तरह एक उपयुक्त रोस्टर प्रणाली होनी चाहिए, ताकि मामलों का आवंटन पारदर्शी तरीके से हो सके और इसमें मानवीय हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश न रहे। उन्होंने कहा, ‘‘अगर उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों की तर्ज पर रोस्टर की एक उपयुक्त प्रणाली लागू करे, तो वह वादियों के प्रति अधिक जवाबदेह बन जाएगा। इससे प्रधान न्यायाधीश के स्तर पर भी किसी तरह के मानवीय हस्तक्षेप की गुंजाइश खत्म हो जाएगी।’’ पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में एक ही श्रेणी के मामले कई अलग-अलग पीठों को सौंपे जा सकते हैं, जिससे वादियों में यह अनिश्चितता बनी रहती है कि उनके मामलों की सुनवाई किस पीठ के समक्ष होगी। शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश ने यह भी सुझाव दिया कि नये दायर मामलों को स्वतः ही सूचीबद्ध किया जाना चाहिए, ताकि मनमानी को खत्म किया जा सके और यह सुनिश्चित हो सके कि वादियों को सुनवाई की तारीख पाने के लिए बार-बार अदालत के चक्कर न लगाने पड़ें।


उन्होंने कहा, ‘‘नये मामलों को सूचीबद्ध करने में पारदर्शिता लाने के लिए स्वत: तरीके से तारीख मिलना ही एकमात्र समाधान है।’’ उन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान कर्नाटक उच्च न्यायालय में इसे अपनाये जाने का हवाला दिया, जहां इस प्रक्रिया से मामलों को समय पर सूचीबद्ध किया जाना सुनिश्चित हुआ। न्यायमूर्ति ओका ने अदालतों द्वारा मामलों के निस्तारण के लिए समय-सीमा तय करने की परंपरा की भी आलोचना की, जिसमें संबंधित अदालतों में लंबित मामलों और काम के बोझ पर ध्यान नहीं दिया जाता। उन्होंने कहा कि इस तरह के निर्देश उन सुविधा-संपन्न पक्षकारों के लिए एक अलग व्यवस्था बना देते हैं, जो उच्च अदालतों का दरवाजा खटखटा सकते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘इन आदेशों के चलते हम विशेषाधिकार प्राप्त वादियों की एक और श्रेणी बना रहे हैं।’’ उन्होंने इस व्यवस्था की तुलना मंदिरों में आम दर्शनार्थियों और वीआईपी के लिए तय अलग-अलग कतारों से की। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और प्रशांत भूषण, दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रेखा शर्मा, ममता तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा, आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता योगेंद्र यादव शामिल हुए। सिब्बल ने अपने संबोधन में कहा कि देश एक संस्थागत संकट का सामना कर रहा है, जिसमें न्यायपालिका के प्रति जनता का भरोसा धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।

कोई टिप्पणी नहीं: