पटना : पुश्तैनी जमीन को सरकारी रास्ता बताकर नहीं हटाया जा सकता कब्जा! - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

पटना : पुश्तैनी जमीन को सरकारी रास्ता बताकर नहीं हटाया जा सकता कब्जा!

  • पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला,अधिकारियों के लिए जारी किए दिशा-निर्देश

patna-high-court
पटना (संवाददाता) । बिहार में पुश्तैनी जमीन,पुरानी जमाबंदी और जमीन से बेदखली को लेकर पटना हाईकोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है।अदालत ने स्पष्ट किया कि जमीन के स्वामित्व को लेकर गंभीर विवाद होने पर प्रशासन केवल अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया के जरिए मालिकाना हक का फैसला नहीं कर सकता।ऐसे मामलों में राजस्व अभिलेखों की जांच, संबंधित पक्षों को सुनवाई का उचित अवसर और कानून के अनुसार कार्रवाई जरूरी है। यह मामला Asharfi Yadav बनाम State of Bihar एवं अन्य,सिविल रिट याचिका संख्या 526/2015 से संबंधित है। उपलब्ध विवरण के अनुसार,न्यायमूर्ति राज कुमार की एकलपीठ ने 10 अगस्त 2026 को इस मामले में फैसला सुनाया।


 करीब 100 साल पुराने जमीन बंदोबस्त से जुड़ा था मामला

मामला मधुबनी जिले के लौकही थाना क्षेत्र के अमरपुरा गांव का है।याचिकाकर्ता अशर्फी यादव का दावा था कि उनके दादा बाबू लाल गोप को दरभंगा महाराजा ने 20 जुलाई 1926 को तीन कट्ठा जमीन बंदोबस्त में दी थी।परिवार का कहना था कि वह लंबे समय से जमीन पर कब्जे में था और लगान भी जमा करता रहा था। विवाद खेसरा संख्या 1099 और खाता संख्या 275 की छह धुर जमीन को लेकर था।राजस्व अधिकारियों ने जमीन को गैरमजरुआ आम रास्ता बताते हुए अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था।अंचलाधिकारी ने 5 मई 2014 को आदेश जारी किया,जबकि इसके खिलाफ अपील भी खारिज कर दी गई। इसके बाद याचिकाकर्ता ने पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।


 हाईकोर्ट ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के जवाब और उपलब्ध राजस्व अभिलेखों की उचित जांच तथा प्रभावी सुनवाई की प्रक्रिया में कमी रही थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिहार सार्वजनिक भूमि अतिक्रमण अधिनियम,1956 का उपयोग वास्तविक सार्वजनिक भूमि से अतिक्रमण हटाने के लिए किया जा सकता है।हालांकि,जहां जमीन के मालिकाना हक को लेकर गंभीर विवाद हो,वहां इस प्रक्रिया को स्वामित्व तय करने का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।


अंचलाधिकारी और कलेक्टर के आदेश रद्द

हाईकोर्ट ने अंचलाधिकारी के 5 मई 2014 और कलेक्टर के 18 नवंबर 2014 के आदेशों को रद्द कर दिया।मामले को दोबारा विचार के लिए संबंधित अंचलाधिकारी के पास भेजते हुए चार महीने के भीतर कानूनी प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया।साथ ही,तब तक जमीन की मौजूदा स्थिति बनाए रखने को कहा गया।


बिहार के अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण निर्देश

फैसले के अनुसार,अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई से पहले संबंधित अधिकारियों को इन दस्तावेजों की जांच करनी चाहिए:

 पुरानी जमाबंदी और खतियान।

 रजिस्टर-2 एवं राजस्व अभिलेख।

 पुराने बंदोबस्त से संबंधित दस्तावेज।

 संबंधित न्यायालयों के फैसले और अन्य उपलब्ध साक्ष्य।

 संबंधित पक्षों के जवाब एवं उनके स्वामित्व संबंधी दावे।

यदि पुरानी जमाबंदी के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज उपलब्ध हैं और राज्य को उस पर आपत्ति है,तो कानून के अनुसार सक्षम सिविल न्यायालय में उचित कार्यवाही की आवश्यकता हो सकती है।वहीं,अपने स्वामित्व का दावा करने वाले व्यक्ति को भी परिस्थितियों के अनुसार सक्षम न्यायालय से अपने अधिकार की घोषणा मांगनी पड़ सकती है। अदालत ने दुर्भावनापूर्ण या अनुचित लाभ लेने के उद्देश्य से की गई झूठी शिकायतों के मामले में कानून के अनुसार कार्रवाई पर विचार करने की बात भी कही।


 जमीन मालिकों के लिए क्या है इसका मतलब?

यह फैसला पुश्तैनी जमीन और पुरानी जमाबंदी से जुड़े विवादों में राजस्व अभिलेखों की जांच तथा उचित कानूनी प्रक्रिया के महत्व को रेखांकित करता है।हालांकि,इसका अर्थ यह नहीं है कि हर पुरानी जमाबंदी जमीन पर मालिकाना हक का अंतिम प्रमाण है या किसी भी सार्वजनिक रास्ते से अतिक्रमण नहीं हटाया जा सकता।प्रत्येक मामले में जमीन की प्रकृति,उपलब्ध दस्तावेज और लागू कानून के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।

कोई टिप्पणी नहीं: