उन्होंने कहा कि इससे सदस्य देशों के सामने एक ऐसी स्थिति पैदा हो जाती है, जिसमें उन्हें किसी निर्णय को स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। उन्होंने कहा कि यह उस संगठन के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है, जिसकी विश्वसनीयता पर पहले से ही सवाल उठ रहे हैं। पुरी ने कहा, ‘‘इसी संदर्भ में हम अपने देश के संबंध में कुछ विशेष रूप से गंभीर तथ्यात्मक गलतियों की ओर ध्यान दिलाना चाहते हैं।’’ उन्होंने कहा कि सॉल की रिपोर्ट में कहा गया है कि सुरक्षा परिषद ने 2003 में एक आपराधिक गिरोह के सरगना को अल-कायदा से संबंधों के कारण सूचीबद्ध किया था। रिपोर्ट में इस गिरोह का उल्लेख ‘‘भारत स्थित डी-कंपनी’’ के रूप में किया गया है। पुरी ने कहा, ‘‘अलग से पढ़ने पर यह पंक्ति वास्तविक स्थिति से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करती है।’’ डी-कंपनी को भारत स्थित गिरोह बताए जाने को सख्ती से खारिज करते हुए पुरी ने कहा कि इस आपराधिक संगठन और इसके सूचीबद्ध सरगना दाऊद इब्राहिम को 1993 से ही आतंकवादी हमलों के सिलसिले में भारत में वांछित घोषित किया गया है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अल-कायदा प्रतिबंध व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा, ‘‘यह बात संयुक्त राष्ट्र की 1267 प्रतिबंध व्यवस्था के तहत सूचीबद्ध करने के कारणों के विवरण में स्पष्ट रूप से दर्ज है।’’
पुरी ने कहा, ‘‘इस तथ्य का उल्लेख नहीं करना खेदजनक है। विशेष अधिकार प्राप्त पदाधिकारियों की ओर से इस तरह की अक्षमता से संगठन को भारी नुकसान पहुंचता है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मैं आधिकारिक रिकॉर्ड के लिए इस तथ्य को स्पष्ट करना चाहता हूं। यह व्यक्ति 2003 में सूचीबद्ध किए जाने से काफी पहले भारत छोड़कर भाग गया था। इसी अवधि में वह हमारे देश से बाहर रहते हुए अल-कायदा और ओसामा बिन लादेन से संबंधों के कारण सूचीबद्ध किया गया था।’’ पुरी ने पाकिस्तान के स्पष्ट संदर्भ में कहा कि दाऊद इब्राहिम अब भी भारत में वांछित अपराधी है और संयुक्त राष्ट्र की सूची के अनुसार, वह उसी देश में रहता है जहां अल-कायदा के नेता ओसामा बिन लादेन का पता लगाया गया था और जहां उसे मार गिराया गया था। ओसामा बिन लादेन को 2011 में पाकिस्तान के एबटाबाद शहर में अमेरिकी नौसेना के सील कमांडो ने एक अभियान के दौरान मार गिराया था। भारत ने सॉल की रिपोर्ट के विभिन्न हिस्सों में ‘‘स्पष्ट पक्षपात’’ होने की बात भी उठाई और विशेष प्रतिवेदक के कार्यालय को लेकर मीडिया में लगाए गए आरोपों पर चिंता जताई। भारत ने कहा कि इस कार्यालय को ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता के उच्चतम मानकों का पालन करना चाहिए। सॉल सिडनी विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय कानून के अध्यक्ष हैं और ऑस्ट्रेलियाई सामाजिक विज्ञान अकादमी के निर्वाचित फेलो हैं। सॉल की रिपोर्ट को लेकर उनके वित्त पोषण के संबंध में लगाए गए आरोपों की भी जांच-पड़ताल हुई है। संयुक्त राष्ट्र के कामकाज पर नजर रखने वाले गैर-सरकारी संगठन ‘यूएन वॉच’ ने मई 2026 में ‘फ्रॉम वॉचडॉग्स टू आइडियोलॉग्स’ शीर्षक से 104 पृष्ठों की एक जांच रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसमें आरोप लगाया गया कि सॉल को चीन से 1,50,000 अमेरिकी डॉलर मिले थे।
यूएन वॉच की जांच रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘चीनी सरकार उनकी सबसे बड़ी वित्तपोषक है, जिसने 2024 में उन्हें 1,50,000 अमेरिकी डॉलर दिए।’’ पुरी ने उन प्रयासों के प्रति भी आगाह किया, जिनके तहत उनके अनुसार आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले लोग अपने कृत्यों को उचित ठहराने के लिए मानवाधिकारों और आतंकवाद-रोधी ढांचे का इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘ऐसा लगता है कि आतंकवाद को प्रायोजित करने वालों के बीच अपने गलत कामों को उचित ठहराने के लिए मानवाधिकारों और आतंकवाद-रोधी ढांचे का इस्तेमाल करना एक चलन बन गया है। मानवाधिकारों का ढांचा आतंकवाद के अपराधियों और कट्टरपंथ तथा उग्रवाद को बढ़ावा देने वालों की शरणस्थली नहीं बन सकता।’’ पुरी ने कहा, ‘‘आतंकवाद को कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता।’’ उन्होंने पाकिस्तान के प्रतिनिधि की ओर से भारत के खिलाफ की गई टिप्पणियों को खारिज किया, जिनमें केंद्रशासित प्रदेश जम्मू कश्मीर और लद्दाख का भी उल्लेख किया गया था। उन्होंने इन आरोपों को ‘‘पूरी तरह से दुष्प्रचार’’ करार दिया और कहा कि इनके पीछे ‘‘संकीर्ण राजनीतिक लाभ’’ हासिल करने की मंशा है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की वास्तविक नीतियों के लिए वहां की सेना जिम्मेदार है। पुरी ने दोहराया कि जम्मू कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न अंग हैं। उन्होंने कहा कि वह पाकिस्तानी प्रतिनिधि की टिप्पणियों पर आगे कोई प्रतिक्रिया देकर उन्हें महत्व नहीं देना चाहते।

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