- प्रशिक्षुओं को प्रमाण-पत्र एवं उत्कृष्ट प्रतिभागियों को पुरस्कार प्रदान
जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी का उद्बोधन एवं अतिथियों के विचार
अपने संबोधन में जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी श्री नीतीश कुमार ने कहा कि महाकवि विद्यापति मैथिली साहित्य एवं भारतीय भक्ति संगीत परंपरा के अमूल्य धरोहर हैं। उनकी पदावली में भक्ति, प्रेम एवं अध्यात्म का अद्भुत समन्वय है। इस कार्यशाला का उद्देश्य नई पीढ़ी को विद्यापति संगीत की समृद्ध परंपरा से जोड़ना एवं इसके संरक्षण तथा संवर्धन के प्रति जागरूक करना है। उन्होंने प्रशिक्षुओं से प्रशिक्षण में प्राप्त ज्ञान को नियमित अभ्यास में शामिल करने का आह्वान किया। इस अवसर पर प्रोफेसर उदय नारायण तिवारी ने विद्यापति के साहित्यिक व्यक्तित्व, मैथिली भाषा एवं उनकी पदावली की विशेषताओं पर प्रकाश डाला। पंडित रवि शंकर मिश्र ने विद्यापति संगीत के शास्त्रीय एवं तालात्मक पक्ष तथा लय और ताल के महत्व को समझाया। दूरदर्शन कलाकार पंडित काशी नाथ झा ने विद्यापति गीतों की पारंपरिक गायन शैली एवं शुद्ध उच्चारण पर अपने विचार रखे। मुख्य प्रशिक्षक पंडित राधा मोहन मिश्र ने चार दिवसीय प्रशिक्षण के अनुभव साझा करते हुए प्रशिक्षुओं की लगन एवं सीखने की उत्सुकता की सराहना की।प्रशिक्षुओं की सांगीतिक प्रस्तुतियां
समारोह में आम्रपाली कला प्रशिक्षण केंद्र के प्रशिक्षुओं द्वारा विद्यापति पदावली पर आधारित सुंदर प्रस्तुतियां दी गईं।
* भैरवी समूह ने ‘जय जय भैरवि असुर भयाउनि’ प्रस्तुत किया। शीतल ने तबले तथा पंखुड़ी ने हारमोनियम पर संगत की।
* मंदाकिनी समूह ने ‘सुनु सुनु रसिया’ गीत प्रस्तुत किया। कृति ने तबले तथा पल्लवी ने हारमोनियम पर संगत की।
* उगना समूह ने ‘नंदक नंद कदम तरु बैसल’ प्रस्तुत किया। श्याम सुंदर मिश्रा ने हारमोनियम तथा आकाश ने तबले पर संगत की।
* विद्यापति समूह ने ‘गे माई हम रहब’ गीत प्रस्तुत किया। आनंद ने हारमोनियम तथा स्वास्तव प्रखर ने तबले पर संगत की।
इन प्रस्तुतियों के माध्यम से प्रशिक्षुओं ने चार दिवसीय प्रशिक्षण में अर्जित संगीत कौशल का सुंदर प्रदर्शन किया।
प्रशिक्षुओं ने साझा किए अनुभव एवं मूल्यांकन परीक्षा में हुए पुरस्कृत
गायन प्रशिक्षु सुश्री प्राची झा ने चार दिवसीय कार्यशाला के अनुभव साझा करते हुए पंडित राधा मोहन मिश्र से प्राप्त प्रशिक्षण, विद्यापति पदावली के भावार्थ, शुद्ध उच्चारण, राग, स्वर, लय एवं ताल की बारीकियों का उल्लेख किया। उन्होंने प्रशिक्षण से प्राप्त ज्ञान को अपने संगीत जीवन में आत्मसात करने का संकल्प व्यक्त किया। कार्यशाला के अंतर्गत 50 वस्तुनिष्ठ प्रश्नों पर आधारित मूल्यांकन परीक्षा आयोजित की गई, जिसमें उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया गया।
* प्रथम पुरस्कार: आनंद कुमार ठाकुर एवं रूबी कुमारी (संयुक्त रूप से)।
* द्वितीय पुरस्कार: श्याम सुंदर मिश्रा, कुमारी स्मृतिलता एवं पंखुड़ी कुमारी (संयुक्त रूप से)।
* तृतीय पुरस्कार: कृतिवाला कुमारी, मंजरी मिश्रा, पंकज कुमार एवं कृति कुमारी (संयुक्त रूप से)।
सभी प्रशिक्षुओं को जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी श्री नीतीश कुमार द्वारा सहभागिता प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया। वहीं, चार दिवसीय कार्यशाला में उत्कृष्ट प्रशिक्षण एवं योगदान के लिए मुख्य प्रशिक्षक पंडित राधा मोहन मिश्र को सम्मान-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।
विशेष सांगीतिक प्रस्तुति एवं समापन
कार्यक्रम के अंतिम चरण में पंडित राधा मोहन मिश्र एवं प्रख्यात तबला वादक पंडित विश्वंभर मिश्रा द्वारा विद्यापति रचित ‘उगना रे मोर कतए गेलाह’ गीत की भावपूर्ण प्रस्तुति दी गई। इसमें प्रख्यात तबला वादक पंडित रवि शंकर मिश्र ने तबले पर संगत की। इस विशेष प्रस्तुति ने उपस्थित अतिथियों एवं श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। आम्रपाली कला प्रशिक्षण केंद्र के युवा कवि एवं प्रशिक्षु शुभम ने कार्यशाला के अनुभव साझा करते हुए आभार व्यक्त किया। संपूर्ण कार्यक्रम का कुशल संचालन श्री शशि चौरसिया द्वारा किया गया। वहीं, चारों दिनों तक संगीत सत्रों में संगतकर्ता के रूप में श्री चंद्रशेखर नाथ झा ने उत्कृष्ट योगदान दिया। अंत में जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी श्री नीतीश कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए सभी प्रशिक्षुओं, मुख्य प्रशिक्षक, आमंत्रित अतिथियों, आयोजन सहयोगियों एवं कार्यक्रम को सफल बनाने में योगदान देने वाले सभी व्यक्तियों के प्रति आभार व्यक्त किया। यह चार दिवसीय कार्यशाला महाकवि विद्यापति की अमूल्य संगीत एवं साहित्यिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने तथा मैथिली भाषा, लोकसंस्कृति एवं संगीत परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हुई।


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